संतुलन और समन्वय

संतुलन और समन्वय :

ईशावास्योपनिषद् बहुत छोटा उपनिषद् है, पर इसमें अत्यन्त गहरे दार्शनिक संकेत हैं। उसमें “विद्या-अविद्या” और “कर्म-अकर्म” के विषय में विशेष रूप से चर्चा की गयी है। इसे समझने के लिए दो स्तर पर देखना पड़ता है – बाह्य (सामान्य अर्थ) और आध्यात्मिक (गूढ़ अर्थ)।

  1. विद्या और अविद्या

अविद्या का आशय यहाँ केवल अज्ञान से नहीं है, बल्कि वे सब लौकिक ज्ञान और कर्म भी हैं जो केवल इन्द्रिय-सुख या सांसारिक प्रगति तक सीमित हों।
विद्या का आशय उच्चतर ज्ञान से है – विशेषकर परमात्मा या आत्मा का ज्ञान।
उपनिषद् कहता है कि केवल अविद्या (सिर्फ लौकिक कर्म और अज्ञान) में लगे रहने वाला “अन्धकार में जाता है”।
परन्तु केवल विद्या (सिर्फ परमात्मज्ञान और संसार को नकार देना) में लगे रहने वाला भी एक “और गहरे अन्धकार में जाता है”।

संतुलन यही है कि मनुष्य को अविद्या के कर्म से संसार में जीवन-यापन और कर्तव्य करना चाहिए, और विद्या से आत्मा की परम साक्षात्कार की ओर बढ़ना चाहिए।
विद्या और अविद्या विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। केवल सांसारिक ज्ञान जीवन को अधूरा छोड़ देता है, और केवल आत्मज्ञान से संसार का कर्तव्य त्यागना भी अधूरापन है। सच्चा मार्ग है – दोनों का समन्वय।

  1. कर्म और अकर्म

कर्म का आशय बाहरी कार्य, यज्ञ, दान, उपासना, सेवा आदि से है।
अकर्म का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। यहाँ इसका गूढ़ भाव है – वह कर्म जो वास्तव में आत्मा को नहीं बाँधता।
यदि कोई मनुष्य केवल कर्म करता है, पर आत्मा और ईश्वर की पहचान नहीं करता, तो वह बंधन में पड़ता है।
यदि कोई अकर्म को (अर्थात केवल निष्क्रिय होकर, कुछ भी न करके) मान लेता है, तो यह भी भ्रांति है।
सच्चा अकर्म यह है कि कर्म करते हुए भी फलासक्ति न रहे। गीता में भी यही कहा गया – कर्मण्येवाधिकारस्ते…

कर्म और अकर्म का अंतर बाहरी क्रिया और आन्तरिक भाव से है। जो कर्म आसक्ति और अहंकार से किया जाता है वह बन्धनकारी है। वही कर्म यदि समर्पण और निस्वार्थ भाव से किया जाए, तो वह “अकर्म” है, अर्थात बन्धनकारी नहीं रहता।

निष्कर्ष –

ईशावास्योपनिषद का दर्शन यह है कि –

केवल विद्या या केवल अविद्या, दोनों से मुक्ति नहीं होती; इनका समन्वय आवश्यक है।
इसी प्रकार केवल कर्म या केवल अकर्म का आग्रह भी अधूरा है; वास्तविकता यह है कि कर्म करते हुए भी अकर्मभाव में रहना चाहिए।
यही संतुलन व समन्वय ही जीवन का सत्य है: कर्तव्य निर्वाह करते हुए आत्मसाक्षात्कार की ओर बढ़ना।

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