Religion and Philosophy

गायत्री जप : संख्या से साधना और साधना से आत्मप्रकाश तक

गायत्री जप : संख्या से साधना और साधना से आत्मप्रकाश तक भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मंत्र केवल कुछ शब्दों का उच्चारण नहीं है। मंत्र एक चेतना-साधना है—ऐसी साधना, जिसमें शब्द धीरे-धीरे विचार बनते हैं, विचार आचरण को प्रभावित करते हैं और आचरण अंततः व्यक्तित्व का निर्माण करता है। गायत्री मंत्र इसी दृष्टि से भारतीय आध्यात्मिक […]

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एक मुट्ठी अनाज और बड़ा संकल्प

🌱 एक मुट्ठी अनाज और बड़ा संकल्प गुरुदेव आचार्य श्रीराम शर्मा जब समाज में जनजागरण और रचनात्मक कार्यों के लिए निकला करते थे, तब उनके पास साधन बहुत सीमित थे। वे लोगों से कहते थे कि बड़े परिवर्तन के लिए बड़े साधनों की नहीं, बड़े संकल्प की आवश्यकता होती है। एक बार किसी व्यक्ति ने

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भारत की सांस्कृतिक चेतना

भारत की सांस्कृतिक चेतनाभारत की सांस्कृतिक चेतना कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि एक सतत बहती हुई नदी है, जिसमें सहस्राब्दियों के विचार, विश्वास और अनुभव विलीन होते रहे हैं। यह चेतना किसी एक दर्शन, एक मत या एक कालखंड की उपज नहीं, बल्कि अनेकता में एकता की उस गहन साधना का परिणाम है, जिसे भारतीय

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महाकाल : स्पेस-टाइम से परे अनंत चेतना का दार्शनिक स्वरूप

महाकाल : स्पेस-टाइम से परे अनंत चेतना का दार्शनिक स्वरूप “काल सबको निगलता है, पर जिसे काल भी स्पर्श न कर सके, वही महाकाल है।” भारतीय दर्शन में “महाकाल” कोई मात्र देवता या पौराणिक प्रतीक नहीं, बल्कि अस्तित्व की उस परम सत्ता का नाम है जो समय, स्थान, कारण और परिणाम की समस्त सीमाओं से

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गायत्री साधना

गायत्री साधना भारतीय अध्यात्म का वह प्रकाशपुंज है, जिसे अनादि काल से ब्रह्मज्ञान का प्रवेशद्वार माना गया है। आधुनिक काल में इस प्राचीन चेतना को जन-जन तक पहुँचाने और उसके गूढ़ दार्शनिक पक्षों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करने का श्रेय युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य को जाता है।आचार्यश्री ने गायत्री महाविद्या को केवल

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स्फोट सिद्धान्त : विविधता में एकता की अनुभूति

स्फोट सिद्धान्त : विविधता में एकता की अनुभूति संस्कृत व्याकरण में स्फोट सिद्धान्त एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका प्रतिपादन मुख्यतः महर्षि भर्तृहरि ने किया था। इस सिद्धान्त के अनुसार बाह्य जगत में हमें अनेक प्रकार के शब्द, ध्वनियाँ, रूप और घटनाएँ दिखाई देती हैं, किंतु हमारे अन्तःकरण में उनकी एक समग्र और अखण्ड अर्थ-प्रतीति

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आधुनिक भौतिकी का “फील्ड” और गीता का “क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ”

आधुनिक भौतिकी का “फील्ड” और गीता का “क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ” भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय का आरम्भ एक अत्यंत महत्वपूर्ण उद्घोषणा से होता है—”इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते” अर्थात् यह शरीर क्षेत्र कहलाता है, और जो इस क्षेत्र को जानता है वह क्षेत्रज्ञ है। गीता में “क्षेत्र” केवल भौतिक शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सम्पूर्ण अनुभव-जगत का

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जीवन में नेगेटिव फीडबैक का महत्व

जीवन में नेगेटिव फीडबैक का महत्व इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में Control System पढ़ते समय हम Negative Feedback की अवधारणा से परिचित होते हैं। सामान्यतः फीडबैक का अर्थ है कि सिस्टम के आउटपुट की जानकारी वापस लेकर उसे इनपुट के साथ तुलना करना। जब यह फीडबैक नकारात्मक होता है, तो वह error को कम करने और सिस्टम

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आचार्य श्रीराम शर्मा

आचार्य श्रीराम शर्मा (Acharya Shriram Sharma) को उनके अनुयायी केवल एक संत या आध्यात्मिक गुरु के रूप में नहीं, बल्कि युग-निर्माता और विचार-क्रांति के प्रवर्तक के रूप में देखते हैं। उनकी कुछ ऐसी विशिष्ट देनें मानी जाती हैं जो उन्हें अनेक पूर्ववर्ती आचार्यों से अलग पहचान देती हैं। पूर्वकाल के अधिकांश आचार्यों ने अध्यात्म, भक्ति

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मंत्र दृष्टा

वैदिक ऋषियों को मंत्र दृष्टा कहा जाता है , किंतु मंत्र तो शब्द ध्वनि है जिसे सुना जा सकता है । ऋषियों ने मंत्र को कैसे देखा ? भारतीय दर्शन, विशेषकर वेद, उपनिषद, तंत्र और योग परंपरा में शब्द (वाणी) को केवल ध्वनि नहीं माना गया है, बल्कि उसे ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है।

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