Religion and Philosophy

आचार्य श्रीराम शर्मा

आचार्य श्रीराम शर्मा (Acharya Shriram Sharma) को उनके अनुयायी केवल एक संत या आध्यात्मिक गुरु के रूप में नहीं, बल्कि युग-निर्माता और विचार-क्रांति के प्रवर्तक के रूप में देखते हैं। उनकी कुछ ऐसी विशिष्ट देनें मानी जाती हैं जो उन्हें अनेक पूर्ववर्ती आचार्यों से अलग पहचान देती हैं। पूर्वकाल के अधिकांश आचार्यों ने अध्यात्म, भक्ति

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मंत्र दृष्टा

वैदिक ऋषियों को मंत्र दृष्टा कहा जाता है , किंतु मंत्र तो शब्द ध्वनि है जिसे सुना जा सकता है । ऋषियों ने मंत्र को कैसे देखा ? भारतीय दर्शन, विशेषकर वेद, उपनिषद, तंत्र और योग परंपरा में शब्द (वाणी) को केवल ध्वनि नहीं माना गया है, बल्कि उसे ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है।

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यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः

यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः : चेतना, वेदान्त और पर्यवेक्षक की भूमिका भारतीय वेदान्त दर्शन का एक अत्यंत गूढ़ और महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है, “यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः”, अर्थात् जैसी हमारी दृष्टि होती है, वैसी ही हमें सृष्टि दिखाई देती है। यहाँ दृष्टि का अर्थ केवल आँखों से देखने की क्षमता नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि, संस्कार,

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Michio Kaku की Hyperspace

सप्ताह की पुस्तक –Michio Kaku की Hyperspace : अध्याय 1 : Worlds Beyond Space and Time (स्थान और समय से परे संसार)-पुस्तक के आरम्भ में मिचियो काकु यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या हमारी इंद्रियाँ वास्तव में सम्पूर्ण वास्तविकता का अनुभव करती हैं। वे एक ऐसे काल्पनिक संसार का उदाहरण देते हैं जिसमें केवल दो

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भाग्य का पुनर्लेखन

भाग्य का पुनर्लेखन कीजिये भाग्य को सामान्यतः एक ऐसी शक्ति के रूप में देखा जाता है जो जन्म के साथ ही निश्चित हो जाती है और जिसे मनुष्य बदल नहीं सकता। किंतु भारतीय दर्शन, उपनिषदों, गीता, योग और अनेक आध्यात्मिक परंपराओं में भाग्य को एक गतिशील प्रक्रिया माना गया है, न कि एक स्थिर और

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महेश्वर सूत्र व कम्प्यूटर विज्ञान

महेश्वर सूत्र व कम्प्यूटर विज्ञान : आज से 2500 वर्ष पूर्व महर्षि पाणिनि द्वारा रचित महेश्वर सूत्र केवल भाषा-विज्ञान नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन में “ध्वनि से सृष्टि” की अवधारणा से जुड़े हैं। महेश्वर सूत्र संकेत देते हैं कि:ध्वनि → शब्दशब्द → ज्ञानज्ञान → चेतनाचेतना → सृष्टि की अनुभूतिअर्थात ध्वनि केवल communication नहीं, बल्कि reality structure

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यजुर्वेद में गणितीय चमकम

कृष्ण यजुर्वेद के अंतर्गत आने वाले चमकम् का एकादश अनुवाक अत्यंत प्रसिद्ध है। इसमें साधक अंत में संख्याओं के माध्यम से पूर्णता, समृद्धि, विस्तार और ब्रह्मांडीय संतुलन की कामना करता है। यह अनुवाक इस प्रकार है: “एका च मे तिस्रश्च मे पञ्च च मे सप्त च मे नव च मे ।एकादश च मे त्रयोदश च

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वेदों में “ऋत”

वेदों में “ऋत” : अर्थ, उपयोगिता और दार्शनिक विवेचना वैदिक साहित्य में “ऋत” एक अत्यंत गूढ़ और केंद्रीय दार्शनिक अवधारणा है। यह केवल एक शब्द या धार्मिक विचार नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की व्यवस्था, संतुलन और सत्य का मूल सिद्धांत है। भारतीय दर्शन में जिस प्रकार “ब्रह्म”, “सत्य” और “धर्म” को आधारभूत तत्व माना गया

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फ्रीक्वेंसी: अस्तित्व की अनसुनी धड़कन

फ्रीक्वेंसी: अस्तित्व की अनसुनी धड़कन जब हम “फ्रीक्वेंसी” शब्द सुनते हैं, तो अक्सर विज्ञान की किसी किताब या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की याद आती है। लेकिन यदि थोड़ा ठहरकर देखें, तो महसूस होता है कि फ्रीक्वेंसी केवल एक भौतिक माप नहीं, बल्कि अस्तित्व की एक गहरी, सर्वव्यापी भाषा है। यह वही अदृश्य लय है जो सूक्ष्म

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ईश्वर की तीन शक्तियाँ: अन्तरंगा, बहिरंगा और तटस्थ

ईश्वर की तीन शक्तियाँ: अन्तरंगा, बहिरंगा और तटस्थ भारतीय दर्शन में ईश्वर को केवल एक सर्वशक्तिमान सत्ता के रूप में ही नहीं, बल्कि चेतना, शक्ति और व्यवस्था के मूल स्रोत के रूप में समझा गया है। वेदांत, उपनिषद, भागवत परंपरा और वैष्णव दर्शन में ईश्वर की कार्यप्रणाली को समझाने के लिए उनकी शक्तियों का विश्लेषण

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