कृष्ण यजुर्वेद के अंतर्गत आने वाले चमकम् का एकादश अनुवाक अत्यंत प्रसिद्ध है। इसमें साधक अंत में संख्याओं के माध्यम से पूर्णता, समृद्धि, विस्तार और ब्रह्मांडीय संतुलन की कामना करता है।
यह अनुवाक इस प्रकार है:
“एका च मे तिस्रश्च मे पञ्च च मे सप्त च मे नव च मे ।
एकादश च मे त्रयोदश च मे पञ्चदश च मे सप्तदश च मे नवदश च मे ।
एकविंशतिश्च मे त्रयोविंशतिश्च मे पञ्चविंशतिश्च मे सप्तविंशतिश्च मे नवविंशतिश्च मे ।
एकत्रिंशच्च मे त्रयस्त्रिंशच्च मे ॥
चतस्रश्च मे अष्टौ च मे द्वादश च मे षोडश च मे विंशतिश्च मे चतुर्विंशतिश्च मे अष्टाविंशतिश्च मे द्वात्रिंशच्च मे षट्त्रिंशच्च मे चत्वारिंशच्च मे चतुष्चत्वारिंशच्च मे अष्टाचत्वारिंशच्च मे ॥
और अंत में:
वाजश्च मे प्रसवश्च मे … भुवनश्चाधिपतिश्च मे ॥”
इस अनुवाक में विषम और सम संख्याओं का क्रम केवल गणना नहीं है। वैदिक दृष्टि से यह संकेत करता है कि जीवन की क्रमिक वृद्धि, ऊर्जा और चेतना का विस्तार,भौतिक और आध्यात्मिक संतुलन,ब्रह्मांड की गणितीय संरचना, पूर्णता और अनंतता की कामना एक साथ समाहित है।
वैदिक विद्वान इसे “Cosmic Enumeration” भी मानते हैं, जहाँ संख्या केवल अंक नहीं बल्कि शक्ति, लय और सृष्टि के सिद्धांत का प्रतीक है।

विषम संख्याएँ → गतिशीलता, सृजन, विस्तार का प्रतीक हैं
सम संख्याएँ → संतुलन, स्थिरता, संरचना का प्रतीक हैं
अंत में “भुवनश्चाधिपतिश्च मे” → समस्त लोकों और चेतना पर आध्यात्मिक अधिकार की प्रार्थना की गई है ।
यजुर्वेद का यह अनुवाक दर्शाता है कि वेदों में गणित, ध्वनि, चेतना और दर्शन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
अंततः यह मंत्र मनुष्य को “अल्प से अनंत” की यात्रा की ओर ले जाता है।
