यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः

यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः : चेतना, वेदान्त और पर्यवेक्षक की भूमिका

भारतीय वेदान्त दर्शन का एक अत्यंत गूढ़ और महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है, “यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः”, अर्थात् जैसी हमारी दृष्टि होती है, वैसी ही हमें सृष्टि दिखाई देती है। यहाँ दृष्टि का अर्थ केवल आँखों से देखने की क्षमता नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि, संस्कार, चेतना और आत्मबोध की समग्र अवस्था से है। वेदान्त कहता है कि मनुष्य बाहरी जगत् को वैसा नहीं देखता जैसा वह वस्तुतः है, बल्कि वैसा देखता है जैसा उसका अन्तःकरण उसे देखने के लिए तैयार करता है। एक ही घटना किसी व्यक्ति को सुखद प्रतीत होती है, दूसरे को दुःखद और तीसरे को तटस्थ। वस्तु वही रहती है, परन्तु दृष्टि बदलते ही अनुभव बदल जाता है।

अद्वैत वेदान्त में जगत् को चेतना का प्रतिबिम्ब माना गया है। जब मनुष्य स्वयं को सीमित शरीर और मन मानता है, तब उसे संसार संघर्ष, भय, स्पर्धा और अभाव से भरा दिखाई देता है। किन्तु जब वही व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप, अर्थात् आत्मा का बोध करता है, तब वही संसार ईश्वर की अभिव्यक्ति, आनन्द और एकत्व का क्षेत्र बन जाता है। इसीलिए वेदान्त में कहा गया है कि संसार को बदलने से पहले दृष्टि को बदलना आवश्यक है। बाह्य जगत् का अनुभव अन्तःचेतना पर निर्भर करता है।

इस सिद्धान्त का अत्यंत सूक्ष्म प्रतिपादन माण्डूक्य उपनिषद् में मिलता है। माण्डूक्य उपनिषद् का चरम निष्कर्ष है:

“शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।”
(माण्डूक्य उपनिषद् 7)

अर्थात् जो शान्त, कल्याणमय और अद्वैत है, वही आत्मा है और वही जानने योग्य है। जब चेतना उस तुरीय अवस्था में पहुँचती है, तब दृष्टा और दृश्य का भेद मिटने लगता है।

आधुनिक विज्ञान, विशेषकर क्वांटम फिजिक्स, यद्यपि वेदान्त की पुष्टि करने के उद्देश्य से विकसित नहीं हुई, फिर भी उसके कुछ निष्कर्ष आश्चर्यजनक रूप से इस दार्शनिक दृष्टिकोण के समीप दिखाई देते हैं। क्वांटम यांत्रिकी के प्रसिद्ध डबल-स्लिट प्रयोग में पाया गया कि सूक्ष्म कण, जैसे इलेक्ट्रॉन, तब तक तरंग की भाँति व्यवहार करते हैं जब तक उन्हें मापा या देखा नहीं जाता। जैसे ही उनका अवलोकन किया जाता है, उनका व्यवहार बदलकर कण जैसा हो जाता है। इसे सामान्यतः Observer Effect कहा जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसका अर्थ यह नहीं है कि मानव मन वास्तविकता को जादुई रूप से बना देता है, बल्कि यह कि मापन और पर्यवेक्षण की प्रक्रिया स्वयं परिणाम को प्रभावित करती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पर्यवेक्षक और पर्यवेक्षित वस्तु पूर्णतः पृथक नहीं हैं।

वेदान्त इससे एक कदम आगे जाता है। वह केवल यह नहीं कहता कि अवलोकन परिणाम को प्रभावित करता है, बल्कि यह कहता है कि सम्पूर्ण अनुभव-जगत् चेतना के माध्यम से ही अर्थ और अस्तित्व प्राप्त करता है। विज्ञान अभी पदार्थ से चेतना को समझने का प्रयास कर रहा है, जबकि वेदान्त चेतना को मूल सत्य मानकर पदार्थ को उसके अनुभव का एक आयाम मानता है।

इसी सन्दर्भ में आधुनिक विचारकों द्वारा कही गई एक अत्यंत सारगर्भित उक्ति भी ध्यान देने योग्य है: “You are who you are when nobody is looking you.” अर्थात् जब कोई आपको नहीं देख रहा होता, तब आप वास्तव में वही होते हैं जो आप हैं। यह वाक्य मनुष्य के बाहरी व्यक्तित्व और उसके वास्तविक स्वरूप के बीच के अंतर को उजागर करता है। समाज की दृष्टि में हम अनेक भूमिकाएँ निभाते हैं, किन्तु एकान्त में, जब कोई दर्शक नहीं होता, तब हमारा वास्तविक चरित्र प्रकट होता है। वेदान्त इसी बात को और गहराई से कहता है कि यदि हम स्वयं को भी देखने वाले मन, विचार और अहंकार से परे जाकर उस शुद्ध साक्षी को पहचान लें जो सबका निरीक्षण कर रहा है, तब हमें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होगा।

इस प्रकार “यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः” केवल एक दार्शनिक सूत्र नहीं, बल्कि जीवन का व्यावहारिक सत्य है। हमारी धारणाएँ, विश्वास, संस्कार, भावनाएँ और चेतना जिस प्रकार की होती हैं, उसी प्रकार का संसार हमारे अनुभव में निर्मित होता है। वेदान्त हमें बाहरी जगत् से संघर्ष करने के बजाय अपनी दृष्टि को शुद्ध करने का मार्ग दिखाता है। माण्डूक्य उपनिषद् यह सिखाता है कि चेतना ही अनुभव का आधार है, और क्वांटम भौतिकी यह संकेत देती है कि पर्यवेक्षक की भूमिका वास्तविकता के स्वरूप से गहराई से जुड़ी हुई है। जब मनुष्य अपने भीतर के साक्षी को पहचान लेता है, तब वह समझता है कि सृष्टि को देखने का ढंग ही उसके अनुभव की दुनिया को आकार देता है। तभी यह सूत्र अपने पूर्ण अर्थ में उद्घाटित होता है कि “यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः”।

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