हिरण्यगर्भ सू‍त्र

हिरण्यगर्भ सू‍त्र, ब्रह्मवाद और सृष्टि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

ऋग्वेद में वर्णित हिरण्यगर्भ सू‍त्र सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में मानव चिंतन का एक अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक स्वरूप प्रस्तुत करता है। वैदिक द्रष्टा जब कहते हैं — “कष्मय देवाय हविषा विधेमः’ — तो यह केवल देवता को समर्पण नहीं है, बल्कि उस मूल तत्व की खोज है जिससे सब उत्पन्न हुआ। यहाँ देव शब्द किसी व्यक्तिवाचक ईश्वर के लिए नहीं, बल्कि उस आद्य ऊर्जा या चेतन सिद्धांत के लिए प्रयुक्त है जिसका अस्तित्व सृष्टि के आरंभ में माना गया है।

यही बिंदु वैदिक चिंतन को कल्पित ईश्वरवाद से अलग करता है। द्रष्टा ईश्वर को एक सृजनकर्ता राजा की तरह नहीं देखते, बल्कि एक सिद्धांत की तरह समझते हैं। यही कारण है कि वे ईश्वर को नहीं, ब्रह्म को खोजते हैं। ब्रह्म का अर्थ है— वह जो सब में है, सबको आधार देता है, पर किसी भी रूप में सीमित नहीं है।

इसी संदर्भ में वैदिक वाक्य “विज्ञानं उपास्व” अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है— ज्ञान का अनुशीलन करो, जिज्ञासा को उपासना बनाओ। यहाँ उपासना का अर्थ अंधविश्वास या अनुष्ठान नहीं, बल्कि निरंतर खोज और परीक्षण है। यह संदेश इस बात को स्थापित करता है कि दुनिया को समझने का मार्ग तर्क, अनुभव और प्रयोग से गुजरता है।

इस दृष्टिकोण को ब्रह्मविज्ञान कहा गया है। ब्रह्मविज्ञान सृष्टि को एक अलौकिक घटना नहीं मानता, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में देखता है। वैदिक द्रष्टाओं के लिए ब्रह्म ऊर्जा था— एक ऐसा तत्त्व जो अव्यक्त से व्यक्त रूप में प्रकट होता है। यह आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों से दूरी नहीं रखता। आज भौतिकी बिग बैंग, क्वांटम फ्लक्चुएशन और कॉस्मिक ऊर्जा की बात करती है। वैदिक चिंतन इसे हिरण्यगर्भ— स्वर्ण अंड— कहता है।

दोनों ही विचार एक ही प्रश्न से शुरू होते हैं:
पहले क्या था?

वेद का उत्तर है— ऊर्जा, चेतना, संभाव्यता। विज्ञान कहता है— ऊर्जा, सघनता, singularity।

फर्क केवल भाषा का है।

वैदिक दृष्टि में सृष्टि एक घटना नहीं, एक सतत प्रक्रिया है। ब्रह्म न सृजित होता है, न नष्ट। यह आधुनिक विज्ञान के law of conservation of energy के समान विचार की ओर संकेत करता है। इस प्रकार ब्रह्मवाद सृष्टि को रहस्य नहीं, खोज बनाता है।

अंत में, यह विचार एक सीधा संदेश देता है:

विश्वास से अधिक मूल्यवान है खोज।
भक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है जिज्ञासा।
और सबसे ऊँची उपासना है ज्ञान का अन्वेषण।

यही वैदिक चिंतन की वैज्ञानिक प्रासंगिकता है।

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