भवसागर (Bhavasāgara)

भवसागर (Bhavasāgara)

अर्थ: “भव” यानी जन्म-मरण का चक्र, और “सागर” यानी समुद्र। भवसागर का मतलब है जन्म-मरण के चक्र का विशाल समुद्र।
यह सांसारिक जीवन के दुःख, मोह और बंधनों का प्रतीक है। मोक्ष पाने के लिए जीवात्मा को इस भवसागर को पार करना होता है।भक्ति और ज्ञान मार्ग में कहा जाता है कि गुरु, भगवान या भक्ति नाव की तरह हैं, जो जीव को भवसागर से पार लगाते हैं। यह हमारी इच्छाओं, आसक्तियों और कर्मों के कारण बार-बार होने वाले जन्मों का प्रतीक है। इसे पार करने का अर्थ है मुक्ति।

सांख्य दर्शन में भवसागर

अर्थ: सांख्य के अनुसार भवसागर = प्रकृति और पुरुष के संयोग से उत्पन्न जन्म-मरण का अनंत चक्र।
कारण: अविद्या (अज्ञान) के कारण पुरुष (शुद्ध चेतना) अपने को प्रकृति (गुणों का खेल) के साथ एक मान लेता है।
भवसागर का स्वरूप: त्रिगुण — सत्त्व, रज, तम — के प्रभाव से उत्पन्न कर्मबंध और पुनर्जन्म।
पार करने का उपाय:

  1. विवेक ज्ञान — पुरुष और प्रकृति का भेद जानना।
  2. यह समझना कि “मैं न शरीर हूँ, न मन, न इंद्रियाँ — मैं शुद्ध साक्षी हूँ”।
  3. ज्ञान से पुरुष प्रकृति से असंग हो जाता है, और पुनर्जन्म समाप्त होता है।
  4. वेदांत में भवसागर

अर्थ: अद्वैत वेदांत के अनुसार भवसागर = माया द्वारा उत्पन्न संसार का भ्रम।
कारण: ब्रह्म (असीम सत्य) को न जानकर आत्मा अपने को शरीर-मन मान लेती है, जिससे संसार का अनुभव होता है।
भवसागर का स्वरूप: नाम-रूप का अनंत प्रवाह, जिसमें जीव माया के आवरण से बंधा है।
पार करने का उपाय:

  1. श्रवण — गुरु से वेदांत ज्ञान सुनना।
  2. मनन — तर्क से शंका का समाधान।
  3. निदिध्यासन — ध्यान में स्थिर होकर “अहं ब्रह्मास्मि” का अनुभव करना।
  4. आत्मज्ञान से यह जानना कि भवसागर कभी वास्तविक था ही नहीं; केवल ब्रह्म ही सत्य है।
  5. मीमांसा में भवसागर

अर्थ: पूर्वमीमांसा के अनुसार भवसागर = कर्मों और उनके फलस्वरूप होने वाला जन्म-मरण का चक्र।
कारण: वेदविहित कर्म न करना या निषिद्ध कर्म करना, जिससे पाप-पुण्य का संचय होता है और पुनर्जन्म चलता रहता है।
भवसागर का स्वरूप: कर्मफल का अनंत चक्र, जिसमें स्वर्ग और नरक भी अस्थायी हैं।
पार करने का उपाय:

  1. वेदविहित कर्मों का नित्य पालन।
  2. यज्ञ, दान, स्वाध्याय और धर्मपालन।
  3. शुद्ध कर्मों से पाप क्षीण होने पर मोक्ष की ओर अग्रसर होना।
    (उत्तरमीमांसा यानी वेदांत, कर्म के साथ ज्ञान की आवश्यकता पर जोर देती है।)
  4. योग दर्शन में भवसागर

अर्थ: पतंजलि के योगसूत्रों के अनुसार भवसागर = चित्तवृत्तियों का प्रवाह, जिससे जीव बार-बार जन्म लेता है।
कारण: क्लेश — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश — जो जन्म-मरण का कारण बनते हैं।
भवसागर का स्वरूप: चित्त की असंयमित अवस्थाएँ, जो कर्मों को जन्म देती हैं और पुनर्जन्म में बाँधती हैं।
पार करने का उपाय:

  1. अष्टांग योग — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि।
  2. समाधि में चित्त का पूर्ण निरोध, जिससे पुरुष का स्वरूप प्रकट होता है।
  3. कैवल्य — पुरुष की पूर्ण स्वतंत्रता, जहाँ पुनर्जन्म समाप्त होता है।

उपनिषदों में भवसागर के प्रतीक-

उपनिषद भवसागर को सीधे “भवसागर” शब्द से हमेशा नहीं बुलाते, लेकिन वे जन्म-मरण और संसार के बंधन को समझाने के लिए कई रूपक देते हैं।

(क) नदी और नाव का रूपक

छांदोग्य उपनिषद (6.14) में संसार को नदी की तरह बताया है, जिसमें जीवात्मा बहता है।

नाव = ज्ञान, नाविक = गुरु, और किनारा = मोक्ष।

अर्थ: जैसे नाविक सही दिशा में नाव ले जाए तो पार उतरना आसान है, वैसे ही गुरु के निर्देश से जीव मोक्ष तक पहुँच सकता है।

(ख) अंधे और लंगड़े का रूपक

कठोपनिषद (1.3.3–9) में शरीर को रथ, इंद्रियों को घोड़े, और मन को लगाम बताया है।

विवेकहीन जीव बिना संयम के भवसागर में भटकता है।

विवेकयुक्त साधक घोड़ों को नियंत्रित कर सुरक्षित मंज़िल तक पहुँचता है।

(ग) बीज और वृक्ष का रूपक

मुण्डक उपनिषद (2.2.5) संसार को एक पीपल के वृक्ष जैसा कहता है, जिसकी जड़ें ऊपर (ब्रह्म) हैं और शाखाएँ नीचे (संसार)।

जब तक जीव इस वृक्ष के फलों (भोगों) में उलझा है, भवसागर से पार नहीं हो सकता।

श्रीमद्भगवद्गीता में भवसागर के प्रतीक-

गीता कई जगह भवसागर शब्द का सीधा प्रयोग करती है, जैसे 7.14, 12.7, 4.36।

(क) माया का सागर

गीता 7.14: “दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया” — यह त्रिगुणमयी माया भवसागर जैसी है, जिसे पार करना कठिन है, पर जो मेरी शरण में आता है, वह पार हो जाता है।

प्रतीक: माया = विशाल और गहरा समुद्र, भगवान = कुशल नाविक।

(ख) ज्ञान को नाव मानना

गीता 4.36: “अथ चैव ते पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥”

यहाँ ज्ञान को “प्लव” यानी नाव कहा गया है, जिससे पापरूपी तूफान के बावजूद भवसागर पार हो सकता है।

(ग) भक्ति को नाव और भगवान को नाविक मानना

गीता 12.6–7: जो भक्त मन और बुद्धि को मुझमें लगाता है, मैं उसे “मृत्युसंसारसागरात्” यानी भवसागर से शीघ्र पार करा देता हूँ।

रूपक: भक्ति = नाव, भगवान = खेवैया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Review Your Cart
0
Add Coupon Code
Subtotal

 
Scroll to Top