भारत में विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार: 94 वर्षों में केवल एक!”

“भारत में विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार: 94 वर्षों में केवल एक!”

भारत में विज्ञान के क्षेत्र में अब तक केवल एक ही व्यक्ति ने नोबेल पुरस्कार जीता है — डॉ. सी. वी. रमन, और वो भी 1930 में। ( भारतीय मूल के अन्य नोबेल पुरस्कार विजेता विदेशी नागरिक थे, उन्होंने विदेशों में ही शोध कार्य किया था )

यानी करीब एक सदी में केवल एक बार, और वो भी तब जब वे भारत में ही कार्यरत थे।

सोचिए आखिर इसकी वजह क्या है?
क्यों आज भी भारत में वैज्ञानिक शोध का स्तर वैश्विक मानकों से पीछे है?
आइए, कुछ प्रमुख कारणों को समझते हैं —

  1. विज्ञान में निवेश की कमी

भारत अपने GDP का केवल 0.64% ही अनुसंधान और विकास (R&D) पर खर्च करता है।
वहीं अमेरिका 3.4% से अधिक खर्च करता है ताकि वैज्ञानिक नवाचार को बढ़ावा दिया जा सके।
जापान, जर्मनी, इज़राइल जैसे देश तो इससे भी आगे हैं।

  1. ब्रेन ड्रेन (प्रतिभा पलायन)

भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर केवल 260 वैज्ञानिक हैं, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन में यह संख्या 4,000 से अधिक है।
क्यों?
क्योंकि हमारे देश की शीर्ष प्रतिभाएँ उच्चतर अवसर, बेहतर प्रयोगशालाएँ और फंडिंग की तलाश में विदेश चली जाती हैं।
हर साल लगभग 25 लाख लोग भारत छोड़कर बाहर बस जाते हैं।
जबकि दुनिया भर में विज्ञान और तकनीक भविष्य तय कर रहे हैं, भारत अभी भी संघर्षरत है। भारत मे वैज्ञानिकों और विज्ञान शिक्षकों को अन्य जॉब (जैसे प्रशासनिक अधिकारी , प्रबंधक आदि) की तुलना में कम सेलरी व कम सुविधाएं मिलती हैं।

  1. खराब बुनियादी ढांचा (Infrastructure)

हमारे विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं में आधुनिक तकनीक, रिसर्च उपकरण और सुविधाओं की कमी है।
कई संस्थानों में वर्षों पुरानी मशीनें और पुस्तकें इस्तेमाल हो रही हैं।

  1. नौकरशाही और लालफीताशाही

अनुसंधान के लिए फंड लेना एक बेहद जटिल प्रक्रिया है।
कई वैज्ञानिकों को नौकरशाहों के टेबिल पर महीनों तक सिर्फ फाइलें दौड़ानी पड़ती हैं ।
नवाचार का दम इस सिस्टम में घुट जाता है।

  1. विज्ञान के प्रति समाजिक उदासीनता

हमारे समाज में विज्ञान और तार्किक सोच के बजाय अंधविश्वास, पाखंड और चमत्कार को महत्व दिया जाता है।
टीवी और मीडिया पर विज्ञान की चर्चा के बजाय सस्ती सनसनी, क्राइम शो, रियलिटी शो और फिल्मी गॉसिप छाए रहते हैं।
यह वही मानसिकता है जिसने हमें सदियों तक गुलामी में रखा।

  1. शिक्षा प्रणाली में बदलाव की कमी

हमारी शिक्षा प्रणाली रट्टा और परीक्षा आधारित है , न कि अन्वेषण, प्रयोग और तर्कशीलता पर केंद्रित।
बच्चों को स्कूल से ही विज्ञान को प्रश्न पूछने और खोजने का माध्यम नहीं, बल्कि एक किताबी ज्ञान की तरह पढ़ाया जाता है। विज्ञान विषय पढ़ने की बजाय प्रतिभासंपन्न युवा इंजिनीयरिंग , मेडिकल , प्रबंधन आदि विषयों को प्राथमिकता देते हैं । वैज्ञानिक बनने की बजाय आई ए एस बनना ज्यादा उचित समझते हैं ।

तो समाधान क्या है?

यदि भारत को वाकई में ‘विश्वगुरु’ बनना है तो हमें—
विज्ञान और अनुसंधान में भारी निवेश करना होगा, विज्ञान विषय पढ़ने वाले युवाओं को देश में ही अवसर और सम्मान देना होगा। वैज्ञानिकों को सैलरी और सुविधाएं प्रशासनिक अधिकारियों से ज्यादा देनी होगी । विज्ञान शिक्षा को नवाचार और सोच पर आधारित बनाना होगा मीडिया और समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना होगा ।

अन्यथा हम हमेशा दूसरों के लिए सस्ता श्रमिक या उपभोक्ता बाजार बनकर रह जाएंगे,
ज्ञान और नवाचार के लीडर नहीं।
अब समय आ गया है कि हम विज्ञान, शिक्षा और तार्किक सोच को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाएं।
यही सच्ची आज़ादी और प्रगति की दिशा है।

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