अर्धचन्द्र (Half Moon)

अर्धचन्द्र (Half Moon): निष्कलुष मन का प्रतीक

भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में प्रतीक केवल सौंदर्य या आस्था के उपकरण नहीं हैं, बल्कि वे गहन दार्शनिक अर्थों के संवाहक हैं। अर्धचन्द्र ऐसा ही एक प्रतीक है, जो मन की शुद्धता, संयम और शीतलता का बोध कराता है।

अर्धचन्द्र और शिव-तत्त्व

महाकवि कालिदास मालविकाग्निमित्रम् में शिव की स्तुति करते हुए संकेत करते हैं कि शिव निष्पाप, निर्मल और संयमित हृदय-मन के अधिष्ठाता हैं। इसी कारण उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सदा विराजमान रहता है।
डॉ. अच्युतानन्द द्विवेदी के अनुसार यह प्रतीक तत्कालीन सामाजिक और मानसिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। शुद्ध, निष्कलुष और शांत मन ही अर्धचन्द्र का अधिकारी है।

वेद भी इसी विचार की पुष्टि करते हैं—

“शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः”
(ऋग्वेद 10.13.1)

अर्थात् हे अमृत के पुत्रों, सुनो।
यहाँ “अमृत” का तात्पर्य निर्मल चेतना से है, जो विकाररहित मन में ही प्रकट होती है।

अर्धचन्द्र का दार्शनिक अर्थ

अर्धचन्द्र केवल एक खगोलीय आकृति नहीं है। यह क्रोध, चंचलता और अस्थिरता के विपरीत स्थित संयमित चेतना का प्रतीक है। भारतीय चिंतन परंपरा में मन को नियंत्रित करने पर विशेष बल दिया गया है।

“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”
(अमृतबिंदु उपनिषद् 2)

मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
अर्धचन्द्र उसी मुक्त, संतुलित और संयमित मन की ओर संकेत करता है।

गणपति, ध्वनि और अर्धचन्द्राकार:

भारतीय परंपरा में गणपतिपूजा रचनात्मक चेतना का प्रतीक मानी जाती है। सुप्रसिद्ध इतिहासकार बालकृष्ण मिश्र के अनुसार गणपति का स्वरूप भारतीय जीवन की सृजनशीलता को दर्शाता है। बाल्यकाल में अर्धचन्द्राकार आकृतियों के माध्यम से वर्णमाला की संरचना समझाई जाती थी। ‘क’, ‘ख’ आदि वर्णों की आकृति इसी मूल संरचना से विकसित मानी जाती है।

इसका संबंध स्वरविज्ञान से भी है। सभी वर्णों की उत्पत्ति शिव के डमरू से मानी जाती है। अर्धचन्द्राकार आकृतियों को परस्पर मिलाने से डमरू की रचना होती है। शिव द्वारा नृत्य के समय डमरू से उत्पन्न 14 सूत्रों को महेश्वर सूत्र कहा गया, जिनके आधार पर पाणिनि ने संस्कृत व्याकरण का विशाल ढाँचा निर्मित किया।

ऋग्वेद में वाणी और ध्वनि के इस दिव्य स्वरूप का उल्लेख मिलता है—

“वाचं यच्छन्ति मनसा”
(ऋग्वेद 10.71.2)

अर्थात् वाणी मन से संयमित होती है।

चन्द्रमा और मन

शिव के मस्तक पर शोभित चन्द्रमा ध्यान और चेतना का प्रतीक है। प्राचीन मूर्तियों और शिलाओं में इसकी निरंतर उपस्थिति इस प्रतीक की प्राचीनता और सार्वभौमिकता को सिद्ध करती है।

मनुष्य की चेतना तीन स्तरों में कार्य करती है—इच्छा, प्रयास और प्राप्ति। जब दृष्टि स्थिर और लक्ष्य स्पष्ट होता है, तब सफलता सहज हो जाती है।

“यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह”
(कठोपनिषद् 2.3.10)

जब इन्द्रियाँ और मन स्थिर हो जाते हैं, वही सर्वोच्च अवस्था है।
जैसे शांत समुद्र में चन्द्रमा का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखता है, वैसे ही शांत और स्वच्छ मन में सत्य का प्रतिबिंब दिखाई देता है। वासनाओं से ग्रस्त मन इस सत्य को ग्रहण नहीं कर पाता।

करुणा, क्षमा और चन्द्रशीतलता:

करुणा, परोपकार, दया और क्षमा जैसे श्रेष्ठ गुण निष्कलुष मन से ही उत्पन्न होते हैं। ऐसा मन दुर्लभ होता है, जो क्षणिक क्रोध पर भी नियंत्रण रख सके।

“अहिंसा परमो धर्मः”
(महाभारत, शान्ति पर्व)

अर्धचन्द्र इसी अहिंसा, शांति और करुणा का प्रतीक है। यह मनुष्य को विषयासक्ति से ऊपर उठकर विवेक के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

आज भी आकाश में पतले अर्धचन्द्र को देखकर मन में शीतलता और शांति का अनुभव होता है। यही इस प्रतीक का वास्तविक संदेश है। शिव के मस्तक पर स्थित अर्धचन्द्र हमें शोषण और हिंसा से मुक्त होकर सर्वधर्म समभाव, संयम और सेवाभाव की ओर ले जाता है।

भागदौड़ और भोगप्रधान आधुनिक जीवन में यह चन्द्रशीतलता हमें ठहराव, करुणा और विवेक का मार्ग दिखाती है।

चित्र: ताजमहल के शीर्ष पर अर्धचन्द्र

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