त्रिशूल : एक दार्शनिक विवेचना

त्रिशूल : एक दार्शनिक विवेचना

त्रिशूल भगवान शिव का केवल आयुध नहीं है, बल्कि वह भारतीय दार्शनिक चिन्तन का गहन प्रतीक है। यह सृष्टि, जीवन और चेतना के उन मूल सिद्धान्तों को अभिव्यक्त करता है जिन पर वैदिक और शैव दर्शन आधारित है।

  1. त्रिशूल और त्रिगुण सिद्धान्त

वेदान्त और सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण प्रकृति तीन गुणों से बनी है।

सत्त्व – शुद्धता, ज्ञान और संतुलन
रजस् – क्रिया, इच्छा और गति
तमस् – जड़ता, अज्ञान और अवरोध

त्रिशूल की तीन धाराएँ इन तीनों गुणों का प्रतीक मानी जाती हैं। शिव का त्रिशूल धारण करना यह संकेत देता है कि वे इन तीनों गुणों से परे हैं, किन्तु उन पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं। यह विचार शिव पुराण में निहित शिव के “गुणातीत” स्वरूप से मेल खाता है।

  1. सृष्टि, स्थिति और संहार

त्रिशूल की तीन नोकें ब्रह्मा, विष्णु और शिव के त्रिकालिक कार्यों की ओर संकेत करती हैं।

  • सृष्टि
  • स्थिति
  • संहार

यह त्रय वेदों में वर्णित ऋत और ब्रह्माण्डीय अनुशासन का दार्शनिक विस्तार है। ऋग्वेद में सृष्टि को एक चक्रीय प्रक्रिया माना गया है, जहाँ विनाश अंत नहीं, बल्कि नवसृजन की भूमिका है। त्रिशूल इसी चक्रीय सत्य का प्रतीक बनता है।

  1. त्रिकाल और मानव जीवन

त्रिशूल को भूत, वर्तमान और भविष्य का प्रतीक भी माना जाता है। शिव का त्रिशूल यह दर्शाता है कि काल स्वयं उनके अधीन है। यह विचार यजुर्वेद के उस भाव से जुड़ता है, जहाँ काल को ब्रह्म की अभिव्यक्ति कहा गया है। दार्शनिक रूप से यह मनुष्य को समय की सीमाओं से ऊपर उठकर चेतना की शाश्वत अवस्था को पहचानने की प्रेरणा देता है।

  1. दुःखत्रय का विनाश

भारतीय दर्शन में तीन प्रकार के दुःख माने गए हैं।

  • आध्यात्मिक
  • आधिभौतिक
  • आधिदैविक

त्रिशूल इन तीनों दुःखों के नाश का संकेतक है। शिव का त्रिशूल धारण करना यह दर्शाता है कि मुक्ति बाह्य संघर्ष से नहीं, बल्कि आन्तरिक बोध और वैराग्य से प्राप्त होती है।

  1. वेद और शैव दर्शन में त्रिशूल का भाव

यद्यपि वेदों में त्रिशूल का प्रत्यक्ष वर्णन कम है, परन्तु वहाँ वर्णित “त्रय” की अवधारणा व्यापक है। देव, मनुष्य और प्रकृति के सामंजस्य का विचार त्रिशूल में साकार होता है। अथर्ववेद में वर्णित अभय और शान्ति की कामना त्रिशूल के संरक्षणात्मक स्वरूप से जुड़ती है।

त्रिशूल एक अस्त्र नहीं, बल्कि दर्शन है। यह जीवन के द्वन्द्वों, गुणों और काल के बीच संतुलन का प्रतीक है। शिव के हाथों में त्रिशूल यह संदेश देता है कि सच्ची शक्ति बाह्य आक्रमण में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, संयम और विवेक में निहित है। इसी कारण त्रिशूल भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में चेतना के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित है।

चित्र – जलीलपुर पाकिस्तान में पूर्व- हड़प्पा काल (-3300 BCE) का बर्तन जिस पर शिव त्रिशूल अंकित है

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