वाणी के चार स्तर

जो आप बोलते हैं

आपकी वाणी (वाक्) के चार स्तर: वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा होते हैं

भारतीय दर्शन में वाणी को केवल बोलने की क्रिया नहीं माना गया है, बल्कि उसे चेतना की गहरी प्रक्रिया के रूप में समझा गया है। शब्द बाहर निकलने से पहले कई सूक्ष्म स्तरों से होकर गुजरता है। तंत्र, वेदांत और भाषाशास्त्र की परंपरा में वाणी के चार स्तर माने गए हैं—परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। ये चारों स्तर मानव चेतना के भीतर शब्द की यात्रा को दर्शाते हैं।

  1. परा वाणी

परा वाणी वाणी का सबसे सूक्ष्म और मूल स्तर है। यह शब्दरहित अवस्था है। यहां न भाषा होती है, न ध्वनि, न ही विचार का स्पष्ट रूप। यह शुद्ध चेतना की अवस्था है, जहां अर्थ बीज रूप में विद्यमान रहता है। परा वाणी को आत्मा या ब्रह्म से जुड़ी हुई माना गया है।
इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे समुद्र की गहराई में पूर्ण शांति हो, जहां तरंगें अभी उत्पन्न ही नहीं हुई हैं। योग और ध्यान की उच्च अवस्थाओं में साधक इसी परा वाणी का अनुभव करता है।

  1. पश्यन्ती वाणी

पश्यन्ती का अर्थ है “देखना”। इस स्तर पर शब्द अभी बोला नहीं गया होता, लेकिन उसका अर्थ स्पष्ट रूप से अनुभव होने लगता है। यहां विचार और अर्थ एक साथ होते हैं।
यह वह अवस्था है जब हमारे भीतर कोई विचार अचानक स्पष्ट हो जाता है, पर हम उसे शब्दों में नहीं ढालते। जैसे किसी समस्या का समाधान मन में चमक जाए, लेकिन अभी उसे कहा न गया हो। पश्यन्ती वाणी को अंतर्ज्ञान और गहन बोध से जोड़ा जाता है।

  1. मध्यमा वाणी

मध्यमा वाणी मानसिक स्तर की वाणी है। इस अवस्था में शब्द मन में बनते हैं, वाक्य संरचना ले लेते हैं, लेकिन अभी मुख से बाहर नहीं आते।
जब हम चुपचाप अपने मन में बात करते हैं, योजना बनाते हैं या कुछ कहने से पहले सोचते हैं, तब हम मध्यमा वाणी में होते हैं। यह वाणी विचार और अभिव्यक्ति के बीच का सेतु है।

  1. वैखरी वाणी

वैखरी वाणी सबसे स्थूल और प्रत्यक्ष स्तर है। यही वह वाणी है जो मुख, जिह्वा, कंठ और श्वास के माध्यम से ध्वनि के रूप में बाहर आती है।
सामान्य बातचीत, भाषण, पाठ, गायन—सब वैखरी वाणी के उदाहरण हैं। यह वाणी सामाजिक संप्रेषण का मुख्य साधन है, लेकिन इसकी जड़ें ऊपर बताए गए तीन सूक्ष्म स्तरों में होती हैं।

वाणी के ये चार स्तर हमें यह समझाते हैं कि शब्द केवल जीभ से नहीं निकलते, बल्कि वे चेतना की गहराइयों से उठते हैं। यदि परा और पश्यन्ती स्तर शुद्ध और संतुलित हों, तो वैखरी वाणी भी मधुर, सत्य और प्रभावशाली होती है।
भारतीय दर्शन इसलिए वाणी की शुद्धि पर इतना जोर देता है, क्योंकि वाणी मन की, और मन चेतना की अभिव्यक्ति है। वाणी को समझना वास्तव में स्वयं को समझने की एक प्रक्रिया है।

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