भाषाविज्ञान के इतिहास में “प्रोटो-इंडो-यूरोपीय

भाषाविज्ञान के इतिहास में “प्रोटो-इंडो-यूरोपीय (Proto-Indo-European, PIE)” को उस आदिम भाषा के रूप में परिकल्पित किया गया है, जिससे यूरोप और एशिया की अनेक भाषाएँ विकसित मानी जाती हैं। दूसरी ओर संस्कृत को विश्व की अत्यंत प्राचीन, संरचित और वैज्ञानिक भाषा माना जाता है। कुछ विद्वानों ने यह मत प्रस्तुत किया है कि वास्तव में जिसे PIE कहा जाता है, वही संस्कृत है या संस्कृत का ही प्राचीन रूप है। इस विचार के समर्थन में विद्वानो द्वारा निम्न तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं।

  1. ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक पूर्णता

संस्कृत की ध्वनि-व्यवस्था अत्यंत व्यवस्थित है। वर्णों का वर्गीकरण उच्चारण-स्थान (कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य आदि) के अनुसार है, जो आधुनिक भाषाविज्ञान की ध्वन्यात्मक प्रणाली से मेल खाता है। PIE के पुनर्निर्माण (reconstruction) में भी जो ध्वनियाँ मानी जाती हैं, वे संस्कृत ध्वनियों से अत्यंत निकट दिखाई देती हैं। उदाहरणतः

मातृ (मातर) — Latin mater, English mother

पितृ (पितर) — Latin pater, English father

यह समानता केवल शब्दों में ही नहीं, बल्कि धातुओं और प्रत्ययों की संरचना में भी मिलती है।

  1. व्याकरणिक संरचना की समानता

संस्कृत में विभक्ति-प्रणाली, लिंग, वचन, पुरुष, काल, वाच्य आदि की जो जटिल व्यवस्था है, वही संरचनात्मक रूप PIE के पुनर्निर्मित व्याकरण में भी दिखाई जाती है। उदाहरणतः आठ विभक्तियाँ संस्कृत में स्पष्ट रूप से उपलब्ध हैं, जबकि यूरोपीय भाषाओं में ये बाद में सरल होकर कम हो गईं। इससे यह तर्क दिया जाता है कि लैटिन ग्रीक लिथुआनिया रोमानी ओल्ड जर्मन भाषा संस्कृत मूल के अधिक निकट है।

  1. पाणिनि का व्याकरण और वैज्ञानिकता

महर्षि पाणिनि (लगभग 5वीं–4थी शताब्दी ई.पू.) का अष्टाध्यायी विश्व का अत्यंत उन्नत व्याकरण माना जाता है। इसकी नियम-व्यवस्था इतनी तार्किक और गणितीय है कि आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान में भी इसका अध्ययन किया जाता है। यदि संस्कृत किसी पूर्व अज्ञात प्रोटो भाषा से विकसित हुई होती, तो इतनी परिपक्व संरचना अचानक प्रकट होना कठिन माना जाता है। अतः कुछ विचारकों के अनुसार संस्कृत ही प्रोटो इंडो यूरोपियन मूल भाषा रही होगी।

  1. वैदिक संस्कृत की प्राचीनता

ऋग्वेद की भाषा (वैदिक संस्कृत) अत्यंत प्राचीन है, जिसका काल सामान्यतः 1500 ई.पू. या उससे भी पूर्व माना जाता है। वैदिक संस्कृत में कई ऐसे रूप मिलते हैं जो बाद की संस्कृत और अन्य इंडो-यूरोपीय भाषाओं के साथ साम्य दिखाते हैं। इससे यह तर्क निकलता है कि PIE कोई अलग भाषा न होकर वैदिक संस्कृत का ही पूर्वरूप या समान रूप हो सकता है। ऋग्वैदिक काल में दाशराज्ञ युद्ध के पश्चात अनेक पराजित संस्कृत भाषी आर्य कबीले अफगानिस्तान से ईरान होते हुए तुर्की रोम ग्रीक एवं अन्य यूरोपीय देशों में जा बसे थे। जिससे कि वहाँ की भाषाएं बनी ।

  1. सांस्कृतिक और शब्दार्थीय साक्ष्य

संस्कृत में प्रकृति, परिवार, समाज, धर्म और दर्शन से जुड़े मूल शब्दों की समृद्ध परंपरा मिलती है। PIE के पुनर्निर्मित शब्द भी अक्सर इसी प्रकार के जीवन-संदर्भों से जुड़े माने जाते हैं। उदाहरणतः

अग्नि (fire) — Latin ignis

नभ (sky) — Latin nebula

यह समानता सांस्कृतिक निरंतरता की ओर संकेत करती है।

  1. PIE का काल्पनिक स्वरूप

एक महत्वपूर्ण तर्क यह भी दिया जाता है कि PIE कोई प्रत्यक्ष प्रमाणित भाषा नहीं है। यह भाषावैज्ञानिक पुनर्निर्माण (hypothetical reconstruction) है, जबकि संस्कृत का वास्तविक साहित्यिक और मौखिक प्रमाण उपलब्ध है। इसलिए कुछ विद्वान कहते हैं कि जब वास्तविक प्रमाण संस्कृत के रूप में मौजूद हैं, तो एक काल्पनिक भाषा की अपेक्षा संस्कृत को ही इंडो यूरोपियन मूल मानना अधिक युक्तिसंगत हो सकता है।

निष्कर्ष

उपरोक्त तर्कों के आधार पर यह मत प्रस्तुत किया जाता है कि प्रोटो-इंडो-यूरोपीय भाषा और संस्कृत में गहरा संबंध है, और संभवतः PIE वास्तव में संस्कृत या वैदिक संस्कृत का ही एक रूप है। यद्यपि मुख्यधारा भाषाविज्ञान PIE को संस्कृत से भी पूर्व की भाषा मानता है, फिर भी संस्कृत की संरचनात्मक परिपूर्णता, प्राचीनता और अन्य भाषाओं से व्यापक समानता इस विचार को बल देती है कि संस्कृत मानव सभ्यता की मूल भाषाओं व प्रमुख भाषा रही है।

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