ध्यान को एक ऐसे आगंतुक के रूप में प्रतिपादित किया जा सकता है, जिसकी उपस्थिति को प्रत्यक्षतः नियंत्रित नहीं किया जा सकता, अपितु जिसके आगमन के लिए केवल आंतरिक अनुकूलता और प्रतीक्षारत सजगता का निर्माण किया जा सकता है। इतिहास साक्षी है कि ध्यान का अनुभव उन सभी व्यक्तियों के जीवन में घटित होता रहा है जिनकी चेतना खुली, ग्रहणशील तथा अन्वेषणशील रही है। तथापि ध्यान को बाह्य शिक्षण या तकनीकी अनुकरण के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास प्रायः भ्रांति का कारण बनता है, क्योंकि मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति न्यूनतम प्रतिरोध के पथ की ओर उन्मुख रहती है। यही प्रवृत्ति व्यक्ति को सरल समाधान, त्वरित उपलब्धि तथा बाह्य आश्रयों की ओर आकर्षित करती है।
न्यूनतम प्रतिरोध की यह आकांक्षा ही आध्यात्मिक क्षेत्र में शोषण की संरचनाओं को जन्म देती है, जहाँ तथाकथित गुरु और गुरुत्व की संस्थाएँ विकसित होती हैं, और परिणामस्वरूप आध्यात्मिक जीवन की शुद्धता विषाक्त हो जाती है। वस्तुतः वह व्यक्ति सर्वाधिक घातक माना जाना चाहिए जो किसी अन्य की आध्यात्मिक पिपासा का दोहन करता है, क्योंकि यह दोहन केवल भौतिक हानि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अस्तित्वगत उत्कर्ष की संभावनाओं को बाधित कर देता है।

भौतिक संपत्ति का अपहरण या सामाजिक असफलता की परिस्थिति तुलनात्मक रूप से उतनी गंभीर नहीं मानी जा सकती, क्योंकि ये तत्व अंतिम सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते। किंतु यदि किसी की चेतना को भ्रमित करके उसकी ध्यान-तृष्णा को कुंठित कर दिया जाए, उसकी दिव्यता की खोज को अवरुद्ध कर दिया जाए, अथवा उसके परमानंद की संभावना को नष्ट कर दिया जाए, तो यह एक गहन नैतिक अपराध बन जाता है, जिसकी क्षतिपूर्ति लगभग असंभव है।
अतः नैतिक संहिताओं, आचार-नियमों अथवा घोषणात्मक नारों के आधार पर जीवन-निर्देशन का प्रयास वस्तुतः जागरूकता के दुर्बल विकल्प मात्र हैं। वास्तविक आवश्यकता चेतना की प्रखरता, सजगता और जागरण की है, क्योंकि केवल जागृत अवस्था में ही जीवन को उसके यथार्थ स्वरूप में अवलोकित किया जा सकता है।
