मंत्र दृष्टा

वैदिक ऋषियों को मंत्र दृष्टा कहा जाता है , किंतु मंत्र तो शब्द ध्वनि है जिसे सुना जा सकता है । ऋषियों ने मंत्र को कैसे देखा ?

भारतीय दर्शन, विशेषकर वेद, उपनिषद, तंत्र और योग परंपरा में शब्द (वाणी) को केवल ध्वनि नहीं माना गया है, बल्कि उसे ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है। इसी कारण मंत्र-जप के भी चार स्तर बताए गए हैं: वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा। ये चारों स्तर चेतना की क्रमशः सूक्ष्म होती अवस्थाओं को प्रकट करते हैं।

  1. वैखरी वाणी

यह वाणी का सबसे स्थूल स्तर है।
इसमें शब्द मुख, जीभ, कंठ और होंठों द्वारा उच्चारित होते हैं।
सामान्य बातचीत और ऊँचे स्वर में किया जाने वाला मंत्र-जप वैखरी स्तर का होता है।
इसमें ध्वनि बाहर सुनाई देती है।
साधना की प्रारंभिक अवस्था में मन को एकाग्र करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

उदाहरण: यदि कोई व्यक्ति “गायत्री मंत्र” का उच्चारण कर रहा है और ध्वनि स्पष्ट सुनाई दे रही है, तो वह वैखरी जप है।

  1. मध्यमा वाणी

यह वाणी का सूक्ष्म स्तर है।
इसमें होंठ और जीभ नहीं चलते।
मंत्र का जप मन के भीतर होता है।
शब्द सुनाई नहीं देते, परन्तु मानसिक रूप से स्पष्ट रहते हैं।
मन और बुद्धि मंत्र के साथ जुड़ने लगते हैं।
यह अवस्था वैखरी से अधिक प्रभावशाली मानी गई है क्योंकि इसमें ऊर्जा बाहर न जाकर भीतर संचित होती है।

उदाहरण: आँखें बंद करके मन ही मन “ॐ नमः शिवाय” का जप करना।

  1. पश्यन्ति वाणी

“पश्यन्ति” का अर्थ है “देखना”।
यहाँ शब्द ध्वनि के रूप में नहीं, बल्कि दृश्य या अनुभूति के रूप में प्रकट होता है।
साधक मंत्र को केवल दोहराता नहीं, बल्कि उसके अर्थ और शक्ति का साक्षात्कार करने लगता है।
शब्द और अर्थ में भेद नहीं रहता।

उदाहरण के लिए, यदि कोई “अग्नि” मंत्र का जप कर रहा है तो वह केवल “अग्नि” शब्द नहीं सुनता, बल्कि अग्नि-तत्त्व की चेतना और शक्ति का अनुभव करता है।

ऋषियों की दृष्टि इसी स्तर के निकट थी। वे मंत्रों को रचते नहीं थे, बल्कि उन्हें देखते (दृष्टा) थे। इसलिए उन्हें मंत्रद्रष्टा ऋषि कहा गया।

  1. परा वाणी

यह वाणी का सबसे सूक्ष्म और मूल स्तर है।
यहाँ शब्द, अर्थ, ध्वनि और चेतना एक हो जाते हैं।
कोई उच्चारण नहीं, कोई मानसिक दोहराव नहीं।
केवल शुद्ध चेतना में स्थित दिव्य स्पंदन शेष रहता है।
यही वह स्तर है जहाँ से सम्पूर्ण वाणी उत्पन्न होती है।

योग और तंत्र के अनुसार परा वाणी मूलाधार या परम चेतना में स्थित होती है। यहीं से वाणी क्रमशः पश्यन्ति, मध्यमा और वैखरी बनकर प्रकट होती है।

ऋषियों ने मंत्र को कैसे देखा?

वेदों के ऋषियों को मंत्रकर्ता (मंत्र बनाने वाले) नहीं कहा गया, बल्कि मंत्रद्रष्टा (मंत्र देखने वाले) कहा गया।
वेदों के मंत्रों को ऋषियों ने अपनी कल्पना से नहीं लिखा था। गहन तप, ध्यान और समाधि में उनकी चेतना इतनी सूक्ष्म हो गई कि वे ब्रह्मांड में व्याप्त दिव्य स्पंदनों को प्रत्यक्ष अनुभव करने लगे।

उनकी स्थिति पश्यन्ति और परा वाणी के स्तर तक पहुँच गई थी। वहाँ मंत्र ध्वनि के रूप में नहीं, बल्कि प्रकाश, कंपन, शक्ति और ज्ञान के रूप में प्रकट होते थे। बाद में उन अनुभूतियों को वैखरी वाणी में व्यक्त किया गया, जिससे वेद मंत्रों का स्वरूप बना।

इसलिए कहा जाता है: “ऋषि मंत्रों के रचयिता नहीं, उनके द्रष्टा थे।”

जैसे कोई वैज्ञानिक गुरुत्वाकर्षण का नियम बनाता नहीं, बल्कि खोजता है, उसी प्रकार ऋषियों ने मंत्रों की खोज की। मंत्र पहले से ब्रह्मांडीय चेतना में विद्यमान थे, ऋषियों ने उन्हें देखा और मानवता के लिए प्रकट किया।

वाणी की यात्रा परा → पश्यन्ति → मध्यमा → वैखरी है, जबकि साधना की यात्रा वैखरी → मध्यमा → पश्यन्ति → परा है।

वैखरी में मंत्र बोला जाता है।
मध्यमा में मंत्र सोचा जाता है।
पश्यन्ति में मंत्र देखा और अनुभव किया जाता है।
परा में साधक स्वयं मंत्रस्वरूप हो जाता है।

यही कारण है कि भारतीय ऋषियों ने मंत्र को केवल शब्द नहीं, बल्कि चेतना की जीवित शक्ति माना है। मंत्र-जप का अंतिम उद्देश्य केवल शब्द दोहराना नहीं, बल्कि उस परम चेतना तक पहुँचना है जहाँ से शब्द का उद्गम होता है।

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