चेवांग नोरफेल भारत के उन महान नवप्रवर्तकों में से हैं जिन्होंने विज्ञान और तकनीक का उपयोग समाज की सबसे बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए किया। उन्हें “आइस मैन ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है। वे लद्दाख के एक सिविल इंजीनियर हैं, जिन्होंने जल संरक्षण के क्षेत्र में ऐसा अभिनव कार्य किया जिससे हजारों लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया।

लद्दाख जैसे शुष्क और अत्यधिक ठंडे क्षेत्र में खेती का सबसे बड़ा संकट पानी की कमी है। चेवांग नोरफेल ने इस समस्या का समाधान खोजते हुए कृत्रिम ग्लेशियर (Artificial Glacier) बनाने की तकनीक विकसित की। उन्होंने सर्दियों में बहने वाले पानी को छोटे-छोटे बाँधों और जल चैनलों के माध्यम से ऐसे स्थानों पर एकत्रित किया जहाँ वह बर्फ बनकर जमा हो जाता था। गर्मियों में यही कृत्रिम ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघलते हैं और खेतों की सिंचाई के लिए आवश्यक जल उपलब्ध कराते हैं। इस तकनीक ने लद्दाख के अनेक गाँवों में कृषि, पेयजल और पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
चेवांग नोरफेल ने अपने जीवन में अनेक कृत्रिम ग्लेशियरों का निर्माण किया, जिनसे हजारों किसानों को लाभ मिला। उनकी यह तकनीक कम लागत वाली, स्थानीय संसाधनों पर आधारित तथा पर्यावरण के अनुकूल है। आज जलवायु परिवर्तन और घटते प्राकृतिक ग्लेशियरों के दौर में उनका यह नवाचार विश्वभर में जल संरक्षण का प्रेरणादायक उदाहरण माना जाता है।
उनकी असाधारण सेवाओं के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। वर्ष 2010 में उन्हें जमनालाल बजाज पुरस्कार तथा 2015 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें ग्रामीण इंजीनियरिंग, जल संरक्षण और नवाचार के लिए कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। उनके आईडिया को चुराकर देश मे चीनी एजेंट ने प्रोपगेंडा की दम पर भले ही मैग्सेसे पुरुस्कार प्राप्त कर लिया हो , लेकिन वे चेवांग नोरफेल के पैरों की धूल भी नही है।
चेवांग नोरफेल का जीवन हमें यह संदेश देता है कि यदि वैज्ञानिक सोच, सामाजिक संवेदनशीलता और दृढ़ संकल्प एक साथ हों, तो सीमित संसाधनों में भी बड़े परिवर्तन संभव हैं। वे केवल एक इंजीनियर नहीं, बल्कि प्रकृति के संरक्षक, समाज सुधारक और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। भारत को उनके योगदान पर गर्व है।
