जब कोई बिजलीघर कोयला जलाता है, कोई फैक्ट्री सीमेंट बनाती है या कोई उद्योग प्राकृतिक गैस का उपयोग करता है, तो उससे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) जैसी ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। ये गैसें ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने में योगदान देती हैं।
इन उत्सर्जनों को कम करने के लिए भारत में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (Carbon Credit Trading Scheme — CCTS) विकसित की जा रही है। मान लीजिए, दो फैक्ट्रियाँ हैं।
फैक्ट्री A — अधिक उत्सर्जन
इसे उत्पादन के दौरान अधिक कोयला जलाना पड़ता है और यह अधिक CO₂ उत्सर्जित करती है। यदि यह निर्धारित उत्सर्जन मानक पूरा नहीं करती, तो उसे सुधार करना पड़ सकता है या लागू नियमों के अनुसार अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट की जरूरत हो सकती है।
फैक्ट्री B — कम उत्सर्जन
इसने ऊर्जा बचाने वाली मशीनें लगाई हैं और कम ईंधन में उत्पादन करना सीख लिया है। योजना के नियमों के अनुसार बेहतर प्रदर्शन करने पर इसे कार्बन क्रेडिट मिल सकते हैं, जिन्हें पात्रता और निर्धारित नियमों के अधीन बेचा जा सकता है।
इस तरह कार्बन उत्सर्जन कम करना उद्योगों के लिए केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आर्थिक प्रोत्साहन भी बन सकता है।
भारत के लिए इसका महत्व:
उद्योगों में ऊर्जा की बचत और दक्षता बढ़ाना।
कोयले तथा अन्य ईंधनों का अधिक कुशल उपयोग करना।
स्वच्छ तकनीक और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना।
कार्बन उत्सर्जन कम करने वाली परियोजनाओं में निवेश आकर्षित करना।
ध्यान दें कि कार्बन क्रेडिट जारी करने, खरीदने और बेचने के नियम योजना के संबंधित प्रावधानों पर निर्भर करते हैं। हर उद्योग को अपने आप क्रेडिट नहीं मिलता।
CBAM का पूरा नाम है Carbon Border Adjustment Mechanism, अर्थात कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था।
यूरोपीय संघ (European Union — EU) ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई है कि दूसरे देशों से आयात होने वाले कुछ औद्योगिक उत्पादों में हुए कार्बन उत्सर्जन की लागत को भी ध्यान में रखा जाए।
यह व्यवस्था 1 जनवरी 2026 से अपने नियमित चरण में लागू है। इसके अंतर्गत सीमेंट, लोहा एवं इस्पात, एल्युमिनियम, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसे निर्धारित क्षेत्रों के उत्पाद शामिल हैं।
एक महत्वपूर्ण बात: CBAM का भुगतान सामान्यतः यूरोपीय संघ के संबंधित आयातक की जिम्मेदारी है। भारतीय निर्यातक पर इसका प्रभाव व्यापारिक अनुबंधों, उत्सर्जन संबंधी डेटा और कीमतों के माध्यम से पड़ सकता है। वास्तविक दायित्व लागू नियमों पर निर्भर करता है।
कार्बन प्राइसिंग का मतलब है कि कार्बन उत्सर्जन को आर्थिक लागत से जोड़ा जाए, ताकि उद्योग उत्सर्जन कम करने के लिए प्रेरित हों।
इसके प्रमुख तरीके हैं:
1.कार्बन टैक्स उत्सर्जन पर सरकार द्वारा निर्धारित कर लगाना।
2.उत्सर्जन ट्रेडिंग सिस्टम सरकार उत्सर्जन संबंधी सीमा या लक्ष्य तय करती है और निर्धारित नियमों के अनुसार कंपनियाँ उत्सर्जन भत्तों का व्यापार कर सकती हैं।
3.कार्बन क्रेडिट निर्धारित नियमों के अनुसार उत्सर्जन में प्रमाणित कमी के बदले क्रेडिट जारी किए जाते हैं, जिनका व्यापार किया जा सकता है।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच तकनीकी सहयोग के अवसर:
- ऊर्जा दक्षता की तकनीक
कम ईंधन में अधिक उत्पादन करने वाली मशीनें, बेहतर बॉयलर, अपशिष्ट ऊष्मा का उपयोग और ऊर्जा ऑडिट की उन्नत तकनीक साझा करना। - MRV (monitoring recording and validation) प्रणाली में सहयोग
उत्सर्जन मापने के तरीके, डिजिटल रिकॉर्ड, गणना-पद्धति और सत्यापन की प्रक्रियाओं को अधिक विश्वसनीय बनाना। - स्वच्छ औद्योगिक तकनीक
हरित हाइड्रोजन, कम कार्बन उत्सर्जन वाली इस्पात निर्माण तकनीक, विद्युतीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग पर सहयोग करना। - प्रशिक्षण और विशेषज्ञों का आदान-प्रदान
भारतीय इंजीनियरों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, संयुक्त कार्यशालाएँ, तकनीकी अध्ययन और विशेषज्ञों के बीच ज्ञान साझा करना। मूल उद्देश्य यह है कि उद्योगों को कम कार्बन उत्सर्जन वाली तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, उत्सर्जन का सही हिसाब रखा जाए और कार्बन उत्सर्जन को आर्थिक निर्णयों से जोड़ा जाए।
भारत के लिए कार्बन बाजार विकसित करना, यूरोपीय संघ के CBAM जैसे नियमों के लिए उद्योगों को तैयार करना तथा MRV प्रणाली और तकनीकी प्रशिक्षण को मजबूत करना महत्वपूर्ण है। इससे भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सकती है और देश के पर्यावरणीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।
चित्र – भारत के पावर सेक्रेटरी श्री पंकज अग्रवाल के साथ यूरोपीय यूनियन के प्रतिनिधि — CABM पर द्विपक्षीय वार्ता दिनांक 12 अक्टूबर 2026


