भारतीय इतिहास से भुलाया गया एक वीर योद्धा :
चिमाजी अप्पा मराठा साम्राज्य के उन महान सेनानायकों में से थे जिनका योगदान भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे प्रसिद्ध पेशवा बाजीराव प्रथम के छोटे भाई थे। उनका जन्म सन् 1707 में हुआ था। उनके पिता बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के प्रथम पेशवा थे। चिमाजी अप्पा ने अपने भाई बाजीराव के साथ मिलकर मराठा शक्ति के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अनेक युद्धों में अपनी अद्वितीय सैन्य प्रतिभा का परिचय दिया।
चिमाजी अप्पा मराठा साम्राज्य के एक महान योद्धा, कुशल सेनापति और दूरदर्शी प्रशासक थे। उनका पूरा नाम चिमणाजी बल्लाल भट्ट था, किंतु वे इतिहास में चिमाजी अप्पा के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे महान पेशवा बाजीराव प्रथम के छोटे भाई थे और मराठा साम्राज्य के विस्तार में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। जिस समय मराठा शक्ति भारत में अपने उत्कर्ष की ओर अग्रसर थी, उस समय चिमाजी अप्पा ने अपनी वीरता, संगठन क्षमता और युद्धकौशल के बल पर साम्राज्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चिमाजी अप्पा का सबसे प्रसिद्ध अभियान पुर्तगालियों के विरुद्ध था। अठारहवीं शताब्दी में पश्चिमी भारत के समुद्री तटों पर पुर्तगालियों का प्रभाव काफी बढ़ गया था। उन्होंने अनेक क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर रखा था और स्थानीय जनता पर अत्याचार भी किए जाते थे। चिमाजी अप्पा ने इस चुनौती का सामना करने का निश्चय किया और सन् 1737 से 1739 के बीच एक सशक्त सैन्य अभियान चलाया। इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण चरण वसई (बसेन) दुर्ग की विजय थी। लंबे संघर्ष और कठिन युद्ध के बाद 1739 में मराठा सेना ने वसई किले पर अधिकार कर लिया और पुर्तगालियों को वहां से सदा के लिए खदेड़ दिया। यह विजय मराठा इतिहास की सबसे गौरवपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जाती है। इससे पश्चिमी तट पर पुर्तगालियों की शक्ति को भारी आघात पहुँचा और मराठा साम्राज्य की प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
चिमाजी अप्पा केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षक भी थे। वसई विजय के बाद उन्होंने पुर्तगालियों द्वारा तोड़े गए अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तथा धार्मिक स्थलों को संरक्षण प्रदान किया। वे प्रजा के हितों के प्रति संवेदनशील थे और प्रशासनिक कार्यों में भी उनकी विशेष रुचि थी। उनकी नीति न्याय, अनुशासन और जनकल्याण पर आधारित थी।
यद्यपि उनका जीवन अपेक्षाकृत अल्पकालिक रहा, फिर भी उन्होंने अपने कार्यों से भारतीय इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। सन् 1740 में उनका निधन हो गया, किंतु उनकी वीरता, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रनिष्ठा की गाथाएँ आज भी स्मरण की जाती हैं। मराठा साम्राज्य के विस्तार और विदेशी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष में चिमाजी अप्पा का योगदान सदैव गौरव और प्रेरणा का विषय बना रहेगा।



