‘फ्रॉम शिवा टू श्रॉडिंगर’ :
डॉ. मृत्युंजय गुहा मजूमदार की पुस्तक का आलेखात्मक सारांश
इस पुस्तक के लेखक डॉ मजूमदार सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक है । इन्होनें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के कैवेंडिश रिसर्च प्रयोगशाला से डॉक्टरेट किया । वहां पर नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक ब्रायन जोसेफसन के साथ कार्य किया। फिर डॉ मजूमदार हार्वर्ड यूनिवर्सिटी एवं IISC बंगलोर में प्रोफेसर रहे। और MIT Schwarzman College of Computing मेसाचुसेट्स USA से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व मशीन लर्निंग में उपाधि प्राप्त की । वर्तमान में UPES में वैज्ञानिक हैं ।

डॉ. मृत्युंजय गुहा मजूमदार की पुस्तक From Shiva to Schrödinger: Unravelling Cosmic Secrets with Trika Shaivism and Quantum Insights आधुनिक विज्ञान और भारतीय दर्शन के बीच संवाद स्थापित करने का एक गंभीर प्रयास है। इस पुस्तक में लेखक ने कश्मीर शैव दर्शन, विशेषतः त्रिक शैव मत, और आधुनिक क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। पुस्तक का मूल उद्देश्य यह दिखाना है कि चेतना, ब्रह्माण्ड और अस्तित्व के संबंध में दोनों परम्पराएँ अनेक स्तरों पर समान दार्शनिक प्रश्न उठाती हैं और कुछ स्थानों पर आश्चर्यजनक वैचारिक साम्य भी दिखाई देता है।
पुस्तक का आरम्भ विज्ञान और अध्यात्म के पारंपरिक विरोधाभास को चुनौती देने से होता है। लेखक का मत है कि विज्ञान और अध्यात्म दोनों सत्य की खोज के साधन हैं। विज्ञान बाह्य जगत का परीक्षण प्रयोग और गणित के माध्यम से करता है, जबकि अध्यात्म चेतना और अनुभव के माध्यम से उसी सत्य को समझने का प्रयास करता है। इसलिए दोनों को प्रतिद्वन्द्वी नहीं, बल्कि पूरक माना जाना चाहिए।
इसके पश्चात लेखक त्रिक शैव दर्शन का परिचय देते हैं। इस दर्शन के अनुसार शिव कोई केवल देवता नहीं, बल्कि परम चेतना का प्रतीक हैं, जो सम्पूर्ण सृष्टि का मूल आधार है। शिव की शक्ति ही समस्त ब्रह्माण्ड के रूप में प्रकट होती है और प्रत्येक जीव उसी परम चेतना का अंश है। कश्मीर शैव दर्शन के महान आचार्यों, विशेषकर अभिनवगुप्त और उत्पलदेव, के विचारों के माध्यम से लेखक बताते हैं कि सम्पूर्ण विश्व चेतना का ही विस्तार है और पदार्थ तथा चेतना में कोई वास्तविक द्वैत नहीं है।
पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण विचार चेतना की प्रकृति पर केन्द्रित है। लेखक का कहना है कि आधुनिक विज्ञान अभी तक चेतना की पूर्ण व्याख्या नहीं कर पाया है, जबकि त्रिक शैव दर्शन चेतना को ही मूल सत्ता मानता है। इसी संदर्भ में वे क्वांटम यांत्रिकी में पर्यवेक्षक (Observer) की भूमिका की चर्चा करते हैं। क्वांटम सिद्धांत में मापन और पर्यवेक्षण से जुड़े प्रश्नों ने वास्तविकता की प्रकृति पर नए विचार प्रस्तुत किए हैं। लेखक इन विचारों और त्रिक दर्शन की “प्रमाता” अर्थात् ज्ञाता की अवधारणा के बीच दार्शनिक समानता खोजने का प्रयास करते हैं। साथ ही वे यह भी स्वीकार करते हैं कि यह वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, बल्कि दार्शनिक तुलना है।
आगे पुस्तक में क्वांटम एंटैंगलमेंट और त्रिक शैव दर्शन के अद्वैत सिद्धांत की तुलना की गई है। लेखक के अनुसार क्वांटम स्तर पर कणों की परस्पर संबद्धता यह संकेत देती है कि ब्रह्माण्ड उतना पृथक और खंडित नहीं है जितना सामान्य अनुभव में दिखाई देता है। इसी प्रकार त्रिक शैव दर्शन भी सम्पूर्ण अस्तित्व को एक अखण्ड चेतना की अभिव्यक्ति मानता है। दोनों ही दृष्टिकोण विविधता के पीछे एक गहरे एकत्व की संभावना की ओर संकेत करते हैं।
पुस्तक का एक अत्यंत रोचक भाग “स्पन्द” सिद्धांत की व्याख्या है। कश्मीर शैव दर्शन में स्पन्द का अर्थ है परम चेतना का सूक्ष्म कम्पन या सृजनात्मक स्पंदन, जिससे सम्पूर्ण सृष्टि का प्राकट्य होता है। लेखक इसकी तुलना आधुनिक क्वांटम फील्ड थ्योरी से करते हैं, जिसके अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विभिन्न ऊर्जा क्षेत्रों की गतिशील अभिव्यक्ति है। यद्यपि दोनों अवधारणाओं की पद्धति और उद्देश्य अलग हैं, फिर भी लेखक इनके बीच वैचारिक साम्य को रेखांकित करते हैं।
समय और स्थान के विषय में भी पुस्तक एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। लेखक के अनुसार त्रिक दर्शन में समय और स्थान परम सत्य नहीं, बल्कि चेतना की अभिव्यक्तियाँ हैं। आधुनिक भौतिकी, विशेषकर आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत तथा ब्रह्माण्ड विज्ञान के नवीन सिद्धांतों में भी समय और स्थान को निरपेक्ष न मानकर गतिशील और सापेक्ष माना गया है। लेखक इस समानता के आधार पर यह विचार प्रस्तुत करते हैं कि ब्रह्माण्ड की अंतिम वास्तविकता हमारी सामान्य इन्द्रियबोध से कहीं अधिक गहन हो सकती है।
पुस्तक का अंतिम भाग आत्मानुभूति और आध्यात्मिक साधना पर केन्द्रित है। लेखक का मत है कि वास्तविक ज्ञान केवल बौद्धिक अध्ययन से प्राप्त नहीं होता, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त होता है। त्रिक शैव दर्शन की प्रत्यभिज्ञा अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान, ध्यान, साधना और अंतर्मुखी अनुभव के माध्यम से संभव है। इसी कारण लेखक विज्ञान और अध्यात्म के बीच संवाद को केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमित न रखकर अनुभवजन्य ज्ञान की दिशा में भी विस्तारित करने का आग्रह करते हैं।
समग्र रूप से यह पुस्तक यह संदेश देती है कि आधुनिक क्वांटम भौतिकी और प्राचीन भारतीय त्रिक शैव दर्शन भले ही भिन्न परम्पराओं से उत्पन्न हुए हों, किन्तु दोनों ब्रह्माण्ड, चेतना और वास्तविकता के कुछ समान मूलभूत प्रश्नों पर विचार करते हैं। लेखक का निष्कर्ष है कि यदि विज्ञान की तर्कसंगत पद्धति और अध्यात्म की अनुभवपरक दृष्टि का समन्वय किया जाए, तो मानव वास्तविकता की अधिक व्यापक और गहन समझ विकसित कर सकता है। यही कारण है कि From Shiva to Schrödinger केवल विज्ञान या दर्शन की पुस्तक नहीं, बल्कि दोनों के मध्य एक सार्थक सेतु निर्मित करने का प्रयास है।
