अज्ञेय ब्रह्म

अज्ञेय ब्रह्म :

वैदिक दर्शन के अनुसार ब्रह्म एक, अखंड और सर्वव्यापी है। समस्त प्राणियों में विद्यमान आत्मा उसी एक परम तत्व की अभिव्यक्ति है, इसलिए बाहरी विविधता के बावजूद समस्त सृष्टि का मूल आधार एक ही है। उपनिषदों में कहा गया है कि जब मनुष्य सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखता है, तब मोह और शोक समाप्त हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इसी एकत्व की पुष्टि करता है, क्योंकि प्रकृति के नियम प्रत्येक स्थान और प्रत्येक काल में समान रूप से लागू होते हैं। जल का रासायनिक संघटन हो या परमाणुओं की संरचना, सम्पूर्ण ब्रह्मांड में एकरूपता दिखाई देती है। इसी कारण विज्ञान के सार्वभौमिक सिद्धांत संभव हो पाते हैं। पृथ्वी, आकाश, जल, वायु, वनस्पति तथा समस्त जीव परस्पर जुड़े हुए हैं और उनका अंतिम आधार वही एक अव्यक्त ब्रह्म है, जो समस्त सृष्टि में व्याप्त होकर भी प्रत्यक्ष नहीं होता।

ब्रह्म का स्वरूप पूर्णतः ज्ञेय नहीं माना गया है। आधुनिक गणित के गोडेल के अपूर्णता सिद्धांत, आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत तथा क्वांटम यांत्रिकी यह संकेत देते हैं कि मानव ज्ञान की सीमाएँ हैं और किसी भी सिद्धांत से संपूर्ण सत्य का वर्णन संभव नहीं है। ब्रह्मांड की अनंतता, कणों की जटिलता तथा मापन की सीमाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि अंतिम सत्य का पूर्ण ज्ञान मनुष्य के लिए कठिन है। इस प्रकार आधुनिक विज्ञान और वैदिक दर्शन दोनों इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि परम सत्य का केवल आंशिक बोध ही संभव है।

ऋग्वेद का नासदीय सूक्त सृष्टि के उद्गम के विषय में अत्यंत उदार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसमें यह स्वीकार किया गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में पूर्ण निश्चितता किसी के पास नहीं है और अनेक संभावित सिद्धांत हो सकते हैं। सत-असत, आकाश, गति, ऊर्जा, आवरण, जल, अमृत-मृत्यु, दिन-रात्रि, देव तथा संशय जैसे विभिन्न दृष्टिकोणों के माध्यम से सृष्टि की व्याख्या की गई है। यह विविध मतों के प्रति सहिष्णुता तथा ज्ञान की निरंतर खोज की भावना को व्यक्त करता है।

वैदिक परंपरा के अनुसार अज्ञेय ब्रह्म को समझने का सर्वोत्तम उपाय विभिन्न सिद्धांतों का समन्वय है। कोई एक मत संपूर्ण सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता, इसलिए अनेक दृष्टिकोणों को जोड़कर ही व्यापक समझ विकसित की जा सकती है। सांख्य दर्शन ब्रह्म को पुरुष और प्रकृति के रूप में, जबकि अन्य परंपराएँ अग्नि-सोम, ज्ञान-बल-क्रिया तथा विभिन्न त्रिविध रूपों में प्रस्तुत करती हैं। इन सभी का उद्देश्य एक ही परम तत्व को अलग-अलग दृष्टियों से समझाना है। वेदों का विभाजन, त्रयी विद्या तथा विभिन्न दार्शनिक परंपराएँ भी अंततः उसी एक ब्रह्म की ओर संकेत करती हैं।

आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान और वैदिक चिंतन में भी अनेक समानताएँ दिखाई देती हैं। हिरण्यगर्भ से सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्मांड का निरंतर विस्तार, सृष्टि का विकास और अंततः उसका पुनः मूल अवस्था में विलय, ब्रह्मांड की एकरूपता तथा दृश्य जगत से कहीं अधिक विशाल अदृश्य सत्ता की अवधारणा, ये सभी विचार आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों से साम्य रखते हैं। इस प्रकार वैदिक दर्शन और आधुनिक विज्ञान दोनों यह स्वीकार करते हैं कि दृश्य संसार के पीछे एक व्यापक, रहस्यमय और अज्ञेय सत्य विद्यमान है, जिसकी पूर्ण अनुभूति मानव बुद्धि की सीमाओं से परे है, किंतु उसके संकेत प्रकृति, विज्ञान और आध्यात्मिक अनुभवों में निरंतर प्राप्त होते रहते हैं।

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