सभ्यताओं का संघर्ष: जब विचारधाराएँ कॉकपिट तक पहुँच जाती हैं-
अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल पी. हंटिंग्टन की प्रसिद्ध पुस्तक The Clash of Civilizations and the Remaking of World Order ने 1996 में विश्व राजनीति को देखने का एक प्रभावशाली सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनका मूल तर्क था कि शीतयुद्ध के बाद दुनिया में संघर्ष केवल राष्ट्रों या राजनीतिक विचारधाराओं के बीच नहीं रहेगा; संस्कृति, सभ्यता, इतिहास और धार्मिक पहचान भी संघर्ष की प्रमुख रेखाएँ बन सकती हैं।उनकी अवधारणा हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करती है—क्या मनुष्य के बीच सबसे बड़ा संघर्ष हथियारों का है या उन विचारों का, जो मनुष्य को हथियार उठाने के लिए प्रेरित करते हैं?
आज यह प्रश्न फिर प्रासंगिक दिखाई देता है।
Flydubai की उड़ान FZ1073 में कॉकपिट के भीतर हुई घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। इस घटना को केवल एक व्यक्ति का अपराध कहकर समाप्त कर देना आसान है। लेकिन इसके पीछे क्या कोई वैचारिक प्रेरणा है ?
दो अलग-अलग दृष्टिकोण-
मानव सभ्यता में धर्म और संस्कृति ने मनुष्य को ईश्वर, जीवन, मृत्यु और दूसरे मनुष्यों के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण दिए हैं।
एक प्रकार की कट्टर और उग्र व्याख्या यह मान सकती है कि सत्य केवल मेरे पास है; जो मेरे मजहबी विश्वास को स्वीकार नहीं करता, वह मेरा शत्रु है। ऐसे अतिवाद में दूसरे धर्म के मानने वालों को समाप्त करना धार्मिक कर्तव्य जैसा प्रस्तुत किया जाता है और स्वयं का बलिदान भी स्वर्ग तथा ईश्वरीय पुरस्कार की कल्पना से जोड़ा जा सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब मजहब, पहचान और राजनीति की कोई उग्रवादी व्याख्या मनुष्य के जीवन से ऊपर स्वयं को स्थापित कर देती है।
इसके विपरीत भारतीय सभ्यता की एक अत्यंत गहरी धारा मनुष्य और समस्त जीव-जगत के बीच एकात्मता को देखती है—
सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
अर्थात—सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी मंगल देखें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
उपनिषदों की दृष्टि इससे भी आगे जाती है—“ईशावास्यमिदं सर्वम्” और “आत्मवत् सर्वभूतेषु” जैसी धारणाएँ संसार को केवल ‘मैं’ और ‘दूसरा’ में बाँटने के बजाय एक व्यापक एकात्मता की ओर ले जाती हैं।
इसीलिए भारतीय चिंतन में एक अत्यंत सुंदर नैतिक भावना दिखाई देती है—
मारने वाले से बचाने वाला बड़ा है।
क्योंकि जीवन को समाप्त करना शक्ति का प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन जीवन की रक्षा करना मानवता और सभ्यता का प्रमाण है।
कॉकपिट में केवल दो व्यक्ति नहीं थे
Flydubai की घटना को इसी दृष्टि से देखें तो कॉकपिट में केवल एक कप्तान और एक सह-पायलट नहीं थे। वहाँ दो मनोवृत्तियों का भी संघर्ष दिखाई देता है—यदि जाँच से हमलावर की वैचारिक प्रेरणा की पुष्टि होती है तो एक ओर विनाशकारी कट्टरता और दूसरी ओर मानव जीवन की रक्षा करने का कर्तव्य।
एक पायलट का पहला धर्म क्या है?
यात्रियों की सुरक्षा।
वह विमान में बैठे लोगों का धर्म, जाति, राष्ट्रीयता या विचारधारा नहीं पूछता। उसका कर्तव्य है कि 180 लोग सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुँचें।
यही सनातन सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि है—व्यक्ति की धार्मिक पहचान से ऊपर उसके जीवन का मूल्य।
किंतु यदि कोई व्यक्ति अपने निजी विश्वास को इतना सर्वोच्च मान ले कि उसे सैकड़ों निर्दोष लोगों का जीवन समाप्त करने का अधिकार महसूस होने लगे, तो संघर्ष केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं रह जाता। वहाँ सवाल उठता है कि कौन-सी विचारधारा मनुष्य के जीवन को सर्वोच्च मूल्य मानती है और कौन-सी विचारधारा अपने विश्वास को मनुष्य के जीवन से ऊपर रख देती है?
क्या यही ‘Clash of Civilizations’ है?
शायद इस घटना को सीधे-सीधे दो धर्मों या दो सभ्यताओं का युद्ध कहना उचित नहीं होगा। इसके लिए जाँच के अंतिम निष्कर्ष आवश्यक हैं।
लेकिन यदि किसी आतंकवादी कृत्य के पीछे सचमुच धार्मिक या वैचारिक उग्रवाद पाया जाता है, तो यह निश्चित रूप से सभ्यतागत मूल्यों के संघर्ष की ओर संकेत करता है।
एक ओर वह उग्रवादी सोच है जो कहती है—
“मेरी विचारधारा ही अंतिम सत्य है; इसलिए दूसरे को बदलो, दबाओ या समाप्त करो।”
और दूसरी ओर वह सनातनी सोच है जो कहती है—
“सत्य की खोज के अनेक मार्ग हो सकते हैं; इसलिए दूसरे को जीने दो।”
पहली सोच दुनिया को हम बनाम वे में बाँटती है।
दूसरी सोच कहती है— सभी जीवों में एक ही आत्मा व्याप्त है ।
“वसुधैव कुटुम्बकम्।”
भविष्य का वास्तविक संघर्ष-
21वीं सदी में सभ्यताओं का संघर्ष केवल मिसाइलों, सेनाओं और सीमाओं पर नहीं होगा। यह संघर्ष विचारों के स्तर पर होगा।
स्कूल या मदरसे में क्या सिखाया जाता है?
बच्चे को दूसरे धर्म के व्यक्ति के बारे में क्या बताया जाता है?
क्या उसे यह सिखाया जाता है कि अलग विचार रखने वाला व्यक्ति शत्रु है?
या यह सिखाया जाता है कि असहमति के बावजूद दूसरे के जीवन और सम्मान की रक्षा करनी है?
यही भविष्य तय करेगा।
आज विमान का कॉकपिट हो, विश्वविद्यालय का परिसर हो, इंटरनेट हो या किसी देश की संसद—मनुष्य जहाँ भी है, वहाँ दो शक्तियाँ साथ-साथ मौजूद हैं:
एक—पहचान के नाम पर विभाजन।
दूसरी—मानवता के नाम पर एकता।
और शायद सभ्यता की असली परीक्षा यही है कि हम इनमें से किसे मजबूत करते हैं।
हंटिंग्टन ने सभ्यताओं के बीच संभावित संघर्ष की चेतावनी दी थी। लेकिन भारतीय दर्शन हमें इससे आगे जाने का रास्ता भी देता है।
संघर्ष सभ्यताओं का भाग्य नहीं होना चाहिए।
यदि मानवता यह सीख सके कि—
“सर्वे भवन्तु सुखिनः” केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि विश्व-व्यवस्था का सिद्धांत है, तो सभ्यताओं का टकराव भी सभ्यताओं के संवाद में बदल सकता है।

क्योंकि अंततः प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा धर्म जीतेगा।
प्रश्न यह है कि—
क्या मनुष्य जीतेगा?
और यदि मनुष्य जीतेगा, तो हिंसा पर करुणा, घृणा पर सह-अस्तित्व और विनाश पर जीवन की विजय होगी।
यही किसी भी महान सभ्यता की वास्तविक पहचान होनी चाहिए l
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ गीता 6:29 ll
