Religion and Philosophy

आत्म-मूल्य self-worth

जीवन में आत्म-मूल्य (self-worth) का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि यह हमारी सोच, निर्णय, और व्यवहार को गहराई से प्रभावित करता है। आत्म-मूल्य यह दर्शाता है कि हम अपने आप को कितना स्वीकारते हैं, सम्मान देते हैं और खुद पर भरोसा रखते हैं। यह हमारे मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। आत्म-मूल्य […]

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महाकुम्भ प्रयागराज

” जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी । फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कथौ गियानी।”  — कबीर दास  अर्थ :- जिसप्रकार सागर में मिट्टी का घड़ा डुबोने पर उसके अन्दर – बाहर पानी ही पानी होता है , मगर फिर भी उस घट ( कुम्भ ) के अन्दर का

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निष्काम कर्म कैसे करें

सांसारिक जीवन में निष्काम भाव से कर्म करना यानि बिना किसी स्वार्थ, फल की इच्छा या अहंकार के अपने कर्तव्यों को निभाना है। यह कठिन प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसे अभ्यास से अपनाया जा सकता है। यहां कुछ सुझाव दिए जा रहे हैं: 1. कर्तव्य को प्राथमिकता दें अपने कर्म को धर्म (कर्तव्य) मानें

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अद्वैत का अधिष्ठान

अद्वैत का अधिष्ठान (स्थापन) का अर्थ है अपने जीवन में अद्वैत के सिद्धांतों को पूर्ण रूप से अपनाना और इसे अनुभव के स्तर तक ले जाना। इसका उद्देश्य आत्मा और ब्रह्म की एकता को न केवल बौद्धिक रूप से समझना बल्कि इसे अपनी चेतना और दैनिक जीवन में स्थिर करना है। इसके लिए एक स्पष्ट

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सर्ग और विसर्ग सृष्टि

सर्ग और विसर्ग सृष्टि के निर्माण और विकास के दो चरणों को दर्शाते हैं। ये भारतीय दर्शन और पुराणों में वर्णित सृष्टि प्रक्रिया से जुड़े हैं। 1. सर्ग (प्रारंभिक सृष्टि) सर्ग का अर्थ है सृष्टि का मूल निर्माण। यह भगवान या ब्रह्मा द्वारा ब्रह्मांड की उत्पत्ति का प्रथम चरण है। इसे “प्राकृतिक सृष्टि” भी कहा

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ब्रह्मांडीय चेतना और मानव चेतना: एक गहरा संबंध

ब्रह्मांडीय चेतना और मानव चेतना: एक गहरा संबंध ब्रह्मांडीय चेतना और मानव चेतना के बीच का संबंध एक प्राचीन और जटिल विषय है, जो दर्शन, धर्म और विज्ञान सभी को प्रभावित करता है।   ब्रह्मांडीय चेतना: इसे सर्वव्यापी चेतना, या एक सार्वभौमिक चेतना भी कहा जाता है जो सभी चीजों को जोड़ती है। यह एक

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चेतना और आत्मा:

चेतना और आत्मा:  चेतना और आत्मा, दोनों ही अत्यंत गहन और जटिल अवधारणाएं हैं जिनके बारे में सदियों से दार्शनिक और आध्यात्मिक विचारक चर्चा करते रहे हैं। दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं ।  चेतना वह है जो हमें अपने आसपास की दुनिया और स्वयं को जानने और समझने में सक्षम बनाती है।

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भावशुद्धि (शुद्ध भाव) और कर्मशुद्धि (शुद्ध कर्म)

भावशुद्धि (शुद्ध भाव) और कर्मशुद्धि (शुद्ध कर्म) भारतीय दर्शन और अध्यात्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ये दोनों तत्व मानव जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं और उसकी आत्मिक उन्नति का आधार बनते हैं। भावशुद्धि का महत्व भावशुद्धि का तात्पर्य हृदय की पवित्रता, निष्कपटता और दूसरों के प्रति सच्ची भावना से है। 1.

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कथावाचक और साधु-सन्यासी

हिंदू धर्म में कथावाचक और साधु-सन्यासी दो अलग-अलग भूमिकाएँ और जीवन के मार्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोनों का महत्व है, लेकिन उनके उद्देश्यों, भूमिकाओं, और जीवनशैली में स्पष्ट अंतर होता है। 1. कथावाचक (कथा सुनाने वाले): भूमिका: कथावाचक धार्मिक कथाएँ, जैसे कि रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, पुराण आदि, को श्रोताओं को सरल और प्रेरणादायक ढंग

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विखंडनवाद (Deconstruction)

विखंडनवाद (Deconstruction)- विखंडनवाद एक साहित्यिक और दार्शनिक दृष्टिकोण है, जिसे 20वीं शताब्दी में जैक्स डेरीडा (Jacques Derrida) ने विकसित किया। इसका उद्देश्य किसी भी पाठ, संरचना या विचार प्रणाली को उसके भीतर मौजूद अंतर्विरोधों और अस्पष्टताओं के माध्यम से विश्लेषण करना है। यह स्थापित विचारों, धारणाओं और अर्थों को चुनौती देता है और दिखाता है

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