Religion and Philosophy

पितृ पक्ष

पितृपक्ष, जिसे हिंदू धर्मशास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, और आत्मिक उत्तरदायित्व का समय है। इसकी आध्यात्मिक अवधारणा में गहन धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक तत्त्व निहित हैं, जो मानव अस्तित्व और परलोक के संबंधों पर विचार करते हैं। पितृपक्ष की अवधारणा को समझने के लिए इसे तीन प्रमुख तात्त्विक […]

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इंग्लैंड की रामायण

इंग्लैंड की रामायण –हरि अनंत हरि कथा अनंता फादर कामिल बुलके ने आपने शोध प्रबंध हेतु 300 रामायणों का संग्रह व अध्ययन किया था । भारत के अतिरिक्त जापान , इंडोनेशिया, श्रीलंका, कंबोडिया, ईरान, लाओस,थाईलैंड, रूस, तुर्कमेनिस्तान आदि में भी प्राचीन रामायण पाई जाती हैं । ग्रीक एवं रोमन पुराण कथाओं में रामकथा से मिलते

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अयोध्या : बाहर और अंदर

एक अयोध्या बाहर है जहां भगवान श्री राम की जन्म भूमि है और एक अयोध्या नगरी हमारा आपका यह शरीर भी है जिसमें आत्मा के अंदर परमात्मा भी विद्यमान है। बाहर की अयोध्या तो प्रतीक मात्र है अंदर की अयोध्या का – अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या |तस्यां हिरण्ययः कोषः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।। [अथर्ववेद 10/02/31 ] अष्टचक्रा

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“शि” तथा “व” ध्वनियाँ

संस्कृत में ध्वनियों का गूढ़ विज्ञान है, और “शि” तथा “व” ध्वनियाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ये ध्वनियाँ न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा और शिव-तत्त्व से भी इनका गहरा संबंध है। “शि” ध्वनि ज्योति (प्रकाश), ज्ञान और चेतना का प्रतीक है।यह शिव के निर्गुण रूप का प्रतिनिधित्व

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संविद, संघिनि और लाघिनि शक्ति

भगवान श्रीकृष्ण की तीन प्रमुख आंतरिक शक्तियाँ (अंतःकरण शक्तियाँ) मानी जाती हैं, जिनके द्वारा ब्रह्मांड की सृष्टि, स्थिति और संहार होता है। संविद शक्ति ज्ञान और चेतना की शक्ति है, जिससे ब्रह्म को अपनी सत्ता और सृष्टि का बोध होता है। यह भगवान की दिव्य ज्ञान-शक्ति है, जिसके कारण वे स्वयं को और अपनी सृष्टि

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सनातन धर्म की विशेषता

सनातन धर्म भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन का मूल है, जो अनादि काल से अस्तित्व में है और अनंत काल तक बना रहेगा। इसका आधार जीवन के सार्वभौमिक सत्य, नैतिक मूल्यों और विश्व कल्याण की भावना पर टिका है। उपरोक्त कथन को विस्तार से निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है: 1. रंगमय

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आत्म-मूल्य self-worth

जीवन में आत्म-मूल्य (self-worth) का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि यह हमारी सोच, निर्णय, और व्यवहार को गहराई से प्रभावित करता है। आत्म-मूल्य यह दर्शाता है कि हम अपने आप को कितना स्वीकारते हैं, सम्मान देते हैं और खुद पर भरोसा रखते हैं। यह हमारे मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। आत्म-मूल्य

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महाकुम्भ प्रयागराज

” जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी । फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कथौ गियानी।”  — कबीर दास  अर्थ :- जिसप्रकार सागर में मिट्टी का घड़ा डुबोने पर उसके अन्दर – बाहर पानी ही पानी होता है , मगर फिर भी उस घट ( कुम्भ ) के अन्दर का

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निष्काम कर्म कैसे करें

सांसारिक जीवन में निष्काम भाव से कर्म करना यानि बिना किसी स्वार्थ, फल की इच्छा या अहंकार के अपने कर्तव्यों को निभाना है। यह कठिन प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसे अभ्यास से अपनाया जा सकता है। यहां कुछ सुझाव दिए जा रहे हैं: 1. कर्तव्य को प्राथमिकता दें अपने कर्म को धर्म (कर्तव्य) मानें

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अद्वैत का अधिष्ठान

अद्वैत का अधिष्ठान (स्थापन) का अर्थ है अपने जीवन में अद्वैत के सिद्धांतों को पूर्ण रूप से अपनाना और इसे अनुभव के स्तर तक ले जाना। इसका उद्देश्य आत्मा और ब्रह्म की एकता को न केवल बौद्धिक रूप से समझना बल्कि इसे अपनी चेतना और दैनिक जीवन में स्थिर करना है। इसके लिए एक स्पष्ट

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