Religion and Philosophy

वाणी के चार स्तर

जो आप बोलते हैं आपकी वाणी (वाक्) के चार स्तर: वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती और परा होते हैं भारतीय दर्शन में वाणी को केवल बोलने की क्रिया नहीं माना गया है, बल्कि उसे चेतना की गहरी प्रक्रिया के रूप में समझा गया है। शब्द बाहर निकलने से पहले कई सूक्ष्म स्तरों से होकर गुजरता है। तंत्र, […]

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त्रिशूल : एक दार्शनिक विवेचना

त्रिशूल : एक दार्शनिक विवेचना त्रिशूल भगवान शिव का केवल आयुध नहीं है, बल्कि वह भारतीय दार्शनिक चिन्तन का गहन प्रतीक है। यह सृष्टि, जीवन और चेतना के उन मूल सिद्धान्तों को अभिव्यक्त करता है जिन पर वैदिक और शैव दर्शन आधारित है। वेदान्त और सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण प्रकृति तीन गुणों से बनी

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अर्धचन्द्र (Half Moon)

अर्धचन्द्र (Half Moon): निष्कलुष मन का प्रतीक भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में प्रतीक केवल सौंदर्य या आस्था के उपकरण नहीं हैं, बल्कि वे गहन दार्शनिक अर्थों के संवाहक हैं। अर्धचन्द्र ऐसा ही एक प्रतीक है, जो मन की शुद्धता, संयम और शीतलता का बोध कराता है। अर्धचन्द्र और शिव-तत्त्व महाकवि कालिदास मालविकाग्निमित्रम् में शिव की स्तुति

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हिरण्यगर्भ सू‍त्र

हिरण्यगर्भ सू‍त्र, ब्रह्मवाद और सृष्टि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण ऋग्वेद में वर्णित हिरण्यगर्भ सू‍त्र सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में मानव चिंतन का एक अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक स्वरूप प्रस्तुत करता है। वैदिक द्रष्टा जब कहते हैं — “कष्मय देवाय हविषा विधेमः’ — तो यह केवल देवता को समर्पण नहीं है, बल्कि उस मूल तत्व की

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संतुलन और समन्वय

संतुलन और समन्वय : ईशावास्योपनिषद् बहुत छोटा उपनिषद् है, पर इसमें अत्यन्त गहरे दार्शनिक संकेत हैं। उसमें “विद्या-अविद्या” और “कर्म-अकर्म” के विषय में विशेष रूप से चर्चा की गयी है। इसे समझने के लिए दो स्तर पर देखना पड़ता है – बाह्य (सामान्य अर्थ) और आध्यात्मिक (गूढ़ अर्थ)। अविद्या का आशय यहाँ केवल अज्ञान से

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गणेश

श्री गणेश जी सर्वस्वरूप, परात्पर परब्रह्‌म साक्षात्‌ परमात्मा हैं । गणेश शब्द का अर्थ है जो समस्त जीव-जाति के “ईश” अर्थात्‌ स्वामी हैं । धर्मपरायण भारतीय जन वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों द्वारा अनादि काल से इन्हीं अनादि तथा सर्वपूज्य भगवान गणपति की पूजा करते आ रहे हैं । हृदय से उपासना करने वाले भक्‍तों को

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भवसागर (Bhavasāgara)

भवसागर (Bhavasāgara) अर्थ: “भव” यानी जन्म-मरण का चक्र, और “सागर” यानी समुद्र। भवसागर का मतलब है जन्म-मरण के चक्र का विशाल समुद्र।यह सांसारिक जीवन के दुःख, मोह और बंधनों का प्रतीक है। मोक्ष पाने के लिए जीवात्मा को इस भवसागर को पार करना होता है।भक्ति और ज्ञान मार्ग में कहा जाता है कि गुरु, भगवान

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त्रिताप

त्रिताप वेदान्त व पुराणों में त्रितापों का वर्णन इस प्रकार मिलता है — “आध्यात्मिकं तु यत् तापं शरीरे मनसि स्थितम्।आधिभौतिकमित्याहुर्दुःखं स्वजनसम्भवम्॥दैवात् सम्भवितं दुःखं तृतीयं तापमुच्यते॥”— (श्रीमद्भागवत, स्कंध 3, अध्याय 6) भावार्थ:शरीर और मन में उत्पन्न दुःख आध्यात्मिक ताप कहलाता है । स्वजन, जीव-जंतु, मनुष्य आदि से उत्पन्न कष्ट आधिभौतिक ताप है। दैविक शक्तियों (प्रकृति, ग्रह

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हमारे तीन शरीर , त्रिदेह

Three Body Problemहमारे तीन शरीर , त्रिदेह वेदान्त दर्शन में शरीर की त्रिविध सत्ता — स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर — अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। १. स्थूल शरीर “स्थूल शरीर वह दृश्य, भौतिक शरीर है जो पंचमहाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—के पञ्चीकरण से उत्पन्न होता है। यह पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार प्राप्त

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वेदों में भगवान विष्णु

मैक्समूलर जैसे तथाकथित विद्वानों ने वेदों की गलत व्याख्याएं कर यह बताने की कोशिश की कि वैदिक आर्य केवल प्राकृतिक देवताओं जैसे इंद्र वरुण अग्नि सूर्य सोम आदि के उपासक थे तथा ब्रह्मा विष्णु शिव गणेश देवियां आदि गुप्तकालीन कल्पनाएं हैं । जबकि वेदों में भगवान विष्णु एक अत्यंत महत्वपूर्ण देवता हैं। वेदों में विष्णु

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