Ashok Tiwari

अर्धचन्द्र (Half Moon)

अर्धचन्द्र (Half Moon): निष्कलुष मन का प्रतीक भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में प्रतीक केवल सौंदर्य या आस्था के उपकरण नहीं हैं, बल्कि वे गहन दार्शनिक अर्थों के संवाहक हैं। अर्धचन्द्र ऐसा ही एक प्रतीक है, जो मन की शुद्धता, संयम और शीतलता का बोध कराता है। अर्धचन्द्र और शिव-तत्त्व महाकवि कालिदास मालविकाग्निमित्रम् में शिव की स्तुति […]

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हिरण्यगर्भ सू‍त्र

हिरण्यगर्भ सू‍त्र, ब्रह्मवाद और सृष्टि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण ऋग्वेद में वर्णित हिरण्यगर्भ सू‍त्र सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में मानव चिंतन का एक अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक स्वरूप प्रस्तुत करता है। वैदिक द्रष्टा जब कहते हैं — “कष्मय देवाय हविषा विधेमः’ — तो यह केवल देवता को समर्पण नहीं है, बल्कि उस मूल तत्व की

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स्पेस और टाइम (दिक और काल)

स्पेस और टाइम (दिक और काल): “स्थानम् कालः च ब्रह्मणि एव स्थितौ स्तः।”“स्थानकालौ ब्रह्मणि निलीयेताम्।” (वृहस्पतिजातक) अर्थात स्थान और काल ब्रह्म के अंदर ही समाविष्ट हैं । आधुनिक भौतिकी में स्पेस-टाइम (दिक-काल) एक ऐसा ढाँचा है जिसमें स्थान और समय दो अलग-अलग चीजें नहीं मानी जातीं, बल्कि एक ही संयुक्त सत्ता के रूप में समझी

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संतुलन और समन्वय

संतुलन और समन्वय : ईशावास्योपनिषद् बहुत छोटा उपनिषद् है, पर इसमें अत्यन्त गहरे दार्शनिक संकेत हैं। उसमें “विद्या-अविद्या” और “कर्म-अकर्म” के विषय में विशेष रूप से चर्चा की गयी है। इसे समझने के लिए दो स्तर पर देखना पड़ता है – बाह्य (सामान्य अर्थ) और आध्यात्मिक (गूढ़ अर्थ)। अविद्या का आशय यहाँ केवल अज्ञान से

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अनुभव और क्वांटम फील्ड सिद्धांत

क्वांटम फील्ड थ्योरी (QFT) के स्तर पर हर चीज़ को ऊर्जा और फील्ड के रूप में समझा जाता है। इलेक्ट्रॉन्स, फोटॉन्स, यहां तक कि “खाली” स्पेस भी क्वांटम फील्ड की हलचलों से भरा है। अब जब लोग कहते हैं कि हमारे जीवन के अनुभव इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नेचर के रूप में मौजूद हैं, तो यह सीधा विज्ञान

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गणेश

श्री गणेश जी सर्वस्वरूप, परात्पर परब्रह्‌म साक्षात्‌ परमात्मा हैं । गणेश शब्द का अर्थ है जो समस्त जीव-जाति के “ईश” अर्थात्‌ स्वामी हैं । धर्मपरायण भारतीय जन वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों द्वारा अनादि काल से इन्हीं अनादि तथा सर्वपूज्य भगवान गणपति की पूजा करते आ रहे हैं । हृदय से उपासना करने वाले भक्‍तों को

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भारत में विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार: 94 वर्षों में केवल एक!”

“भारत में विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार: 94 वर्षों में केवल एक!” भारत में विज्ञान के क्षेत्र में अब तक केवल एक ही व्यक्ति ने नोबेल पुरस्कार जीता है — डॉ. सी. वी. रमन, और वो भी 1930 में। ( भारतीय मूल के अन्य नोबेल पुरस्कार विजेता विदेशी नागरिक थे, उन्होंने विदेशों में ही

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क्या गुरुत्वाकर्षण एन्ट्रापी से जन्मा है?

क्या गुरुत्वाकर्षण एन्ट्रापी से जन्मा है?एक नवीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विश्लेषण गुरुत्वाकर्षण को अब तक एक मूलभूत बल माना जाता है—ऐसा बल जो ब्रह्मांड के हर कण को एक-दूसरे की ओर आकर्षित करता है, जैसा कि आइंस्टीन की सामान्य सापेक्षता (General Relativity) में समझाया गया है। लेकिन हाल ही में वैज्ञानिक समुदाय में एक नई

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भवसागर (Bhavasāgara)

भवसागर (Bhavasāgara) अर्थ: “भव” यानी जन्म-मरण का चक्र, और “सागर” यानी समुद्र। भवसागर का मतलब है जन्म-मरण के चक्र का विशाल समुद्र।यह सांसारिक जीवन के दुःख, मोह और बंधनों का प्रतीक है। मोक्ष पाने के लिए जीवात्मा को इस भवसागर को पार करना होता है।भक्ति और ज्ञान मार्ग में कहा जाता है कि गुरु, भगवान

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त्रिताप

त्रिताप वेदान्त व पुराणों में त्रितापों का वर्णन इस प्रकार मिलता है — “आध्यात्मिकं तु यत् तापं शरीरे मनसि स्थितम्।आधिभौतिकमित्याहुर्दुःखं स्वजनसम्भवम्॥दैवात् सम्भवितं दुःखं तृतीयं तापमुच्यते॥”— (श्रीमद्भागवत, स्कंध 3, अध्याय 6) भावार्थ:शरीर और मन में उत्पन्न दुःख आध्यात्मिक ताप कहलाता है । स्वजन, जीव-जंतु, मनुष्य आदि से उत्पन्न कष्ट आधिभौतिक ताप है। दैविक शक्तियों (प्रकृति, ग्रह

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